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पूर्व IAS मनोज श्रीवास्तव ने कहा-ब्राह्मण जाति नहीं, उन्हें जातिवाद के लपेटे में जबरन लिया जाता है'

IAS नियाज खान के बाद अब एक और रिटायर्ड IAS ब्राह्मणों पर अपनी बात कहकर चर्चा में हैं। राज्य निर्वाचन आयुक्त मनोज श्रीवास्तव ने फेसबुक अकाउंट पर ब्राह्मणों की व्यख्या की है। यह व्यख्या चर्चा का विषय बनी है। श्रीवास्तव ने कहा है कि ब्राह्मण जाति नहीं है, वर्ण है। ब्राह्मणों को जबरन जातिवाद के लपेटे में लिया जाता है। इस पर वरिष्ठ पत्रकारों, साहित्यकारों ने कमेंट किए हैं।
ब्राह्मण जाति नहीं, उन्हें जातिवाद के लपेटे में जबरन लिया जाता है'
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    भोपाल। पूर्व आईएएस अधिकारी मनोज श्रीवास्तव ने जाति, वर्ण और सामाजिक विभाजन को एक लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने ब्राह्मणों को जातिवाद से जोड़ने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने गोत्र और जाति के बीच फर्क, ब्राह्मण समाज की आंतरिक संरचना और आरक्षित वर्गों से आत्ममंथन की आवश्यकता पर विस्तार से अपनी बात रखी है। 

    ब्राह्मणों की पहचान जाति नहीं, गोत्र से

    श्रीवास्तव ने लिखा ब्राह्मणों को जातिवाद के लपेटे में जबरन लिया जाता है। यदि जाति ब्राह्मण को पसंद होती तो स्वयं ब्राह्मणों के भीतर ही वैसी ही जातियां नहीं होतीं जैसी आरक्षितों में मिलती हैं? श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि ब्राह्मण समाज की पहचान जाति से नहीं, गोत्र व्यवस्था से जुड़ी रही है। ब्राह्मण जाति से नहीं गोत्र से चला। जाति और गोत्र में फर्क है। जाति सामाजिक (social) है, गोत्र पैतृक (patrilineal)। भारद्वाज, कश्यप, अत्रि, विश्वामित्र, वशिष्ठ, गौतम, जमदग्नि सबके गोत्र हैं। गोत्र व्यवस्था सगोत्र विवाह का निषेध करती थी। जाति व्यवस्था अपनी जाति में विवाह को प्रोत्साहित करती है।

    स्थानिक समूह, न कि जातिगत दीवारें 

    श्रीवास्तव ने कहा कि ब्राह्मणों के भीतर जो वर्ग दिखते हैं, वे भौगोलिक पहचान हैं, जाति नहीं। ब्राह्मणों की श्रेणियां अवश्य हैं। पर वे स्थानिकता के आधार पर हैं। कोंकणस्थ हैं, देशस्थ हैं, कान्यकुब्ज हैं, सरयूपारीण हैं, गौड़ हैं, कश्मीरी हैं, सारस्वत हैं, मैथिल हैं, उत्कल हैं, द्रविड़ हैं। जाति जैसी चीज उनके यहां नहीं है। ये सब एक ही वर्ण — ब्राह्मण — के अलग-अलग भौगोलिक समूह हैं, पर इनमें से कोई भी एक दूसरे की जाति नहीं है। मतलब, कोंकणस्थ और कान्यकुब्ज के बीच वह दीवार नहीं है जो दो अलग जातियों के बीच होती है। ये स्थानिक भेद हैं, जैसे कि एक देश में अलग-अलग क्षेत्रों के लोग होते हैं। और सबसे ज़रूरी बात — इनमें से कोई भी दूसरे को “नीचा” नहीं मानता। जाति व्यवस्था में ऊंचा-नीचा होता है।

    ज्ञान का आधार और आत्ममंथन की अपील

    उन्होंने कहा कि ब्राह्मण वर्ण में अंतर का आधार ज्ञान था और इसी उदाहरण से समाज को सीख लेनी चाहिए। उन्होंने लिखा-ब्राह्मणों के इन स्थानिक समूहों में वह पदानुक्रम (hierarchy) नहीं है जो जाति व्यवस्था बनाती है। वहां फर्क था भी तो वेद पाठ के आधार पर था। द्विवेदी थे, त्रिवेदी थे, चतुर्वेदी थे। दो तीन चार — जितने वेद पढ़े हों। फर्क का आधार ज्ञान था।

    आरक्षित वर्ग भी जातिमुक्तता कायम करें

    उन्होंने लिखा- यह समझिये कि तब ‘ब्राह्मणों’की बात करनी कुछ लोगों की मजबूरी क्यों हो जाती है। इसलिए कि ब्राह्मण एक जाति है ही नहीं, वह वर्ण है। यानी ब्राह्मण इस बात के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं कि practice before you preach. तब आरक्षित और अनुसूचित जातियां भी वैसी ही जातिमुक्तता कायम करें जैसी ब्राह्मण वर्ण ने करके दिखाई। खुद जाति के मोह में रहें, टोह में रहें और दूसरों पर दोषारोपण करते रहें — यह हमारा पाखंड है। पहले हम स्वयं खंड-खंड में बंटे न रहें, फिर आगे बढ़ें। कम ऑन फ्रेंड्स लेट्स डू इट। चैरिटी बिगिन्स एट होम।

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...

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