इंदौर। फैमिली कोर्ट परिसर में शनिवार को आयोजित नेशनल लोक अदालत कई टूटते रिश्तों को जोड़ने का साक्षी बनी। आपसी मतभेद और विवादों के चलते अलग-अलग रह रहे 10 दंपति, न्यायाधीशों की संवेदनशील समझाइश के बाद फिर से साथ रहने के लिए सहमत हो गए। इनमें एक तलाक के प्रकरण में जज की भावनात्मक टिप्पणी ने निर्णायक भूमिका निभाई।
न्यायाधीश ने पति-पत्नी को समझाते हुए सख्त लहजे में कहा—
“वैवाहिक जीवन को मजाक न बनाएं। अगर आप साथ नहीं रहेंगे तो मासूम बेटे के भविष्य का क्या होगा?”इस सवाल ने दोनों को झकझोर दिया और वे तलाक की जिद छोड़कर साथ रहने को राजी हो गए।
219 मामलों की सुनवाई, 102 प्रकरण राजीनामे से निपटे
नेशनल लोक अदालत के दौरान फैमिली कोर्ट की चार खंडपीठों में कुल 219 प्रकरण सुनवाई के लिए रखे गए थे। इनमें से 102 मामले आपसी राजीनामे के आधार पर समाप्त कर दिए गए। इन राजीनामे वाले मामलों में वे 10 प्रकरण भी शामिल रहे, जिनमें बिछड़े पति-पत्नी फिर एक हो गए।
केस नंबर–1 - ससुराल-मायके के मतभेद खत्म, पत्नी पति के साथ रहने को राजी
माननीय प्रधान न्यायाधीश श्री धीरेन्द्र सिंह के समक्ष प्रस्तुत इस प्रकरण में अमृतपाल सिंह (परिवर्तित नाम), 51 वर्ष, व्यापारी, निवासी खातीवाला टैंक, इंदौर एवं श्रीमती संगीता (परिवर्तित नाम), 43 वर्ष, गृहिणी, निवासी शुजालपुर मंडी (म.प्र.) के मध्य लंबे समय से विवाद चला आ रहा था। दोनों का विवाह वर्ष 2019 में परिवार की सहमति से हुआ था। प्रारंभिक वैवाहिक जीवन सामान्य रहा, लेकिन बाद में आपसी सामंजस्य नहीं बन पाया और सामान्य विवादों के चलते दोनों अलग रहने लगे। पति द्वारा वर्ष 2022 में साथ रहने का प्रकरण कुटुंब न्यायालय में प्रस्तुत किया गया, जिसमें समझाइश की गई। जनवरी 2025 में यह प्रकरण पति के पक्ष में निर्णीत हुआ और पत्नी को साथ रहने का आदेश दिया गया। आदेश के पालन हेतु पति द्वारा पुनः नोटिस भेजे जाने पर पत्नी न्यायालय में उपस्थित हुई। न्यायालय की काउंसलिंग और लोक अदालत की पहल के बाद पत्नी पति के साथ जाने के लिए तैयार हो गई। दोनों पक्ष लोक अदालत में उपस्थित हुए और प्रकरण समाप्त कर साथ रहने चले गए। इस प्रकरण में एडवोकेट डी.एम. शाह एवं एडवोकेट सतीश राठौर द्वारा पैरवी की गई।
केस नंबर–2 -नशे और हिंसा से उपजे विवाद खत्म, पति ने सुधरने का दिया भरोसा
माननीय द्वितीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश श्री सुरेश कुमार चौबे के समक्ष श्रीमती रेखा (परिवर्तित नाम), 26 वर्ष, गृहिणी, निवासी बाणगंगा, इंदौर एवं अंकुर तिवारी (परिवर्तित नाम), 32 वर्ष, व्यापारी, निवासी खंडवा (म.प्र.) का मामला प्रस्तुत हुआ। दोनों का विवाह वर्ष 2019 में इंदौर में संपन्न हुआ था, संतान नहीं है। विवाह के कुछ वर्षों बाद पति की नशे की आदतों के कारण विवाद बढ़े, मारपीट और गाली-गलौज की स्थिति बनी। कोविड काल में भी हालात नहीं सुधरे। मजबूरी में पत्नी ने वर्ष 2022 में भरण-पोषण का प्रकरण दायर किया। केस के दौरान न्यायालय द्वारा विभिन्न स्तरों पर काउंसलिंग कराई गई। लोक अदालत में पति को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने भविष्य में पत्नी को सम्मानपूर्वक रखने तथा पुरानी गलतियां न दोहराने का आश्वासन दिया। इसके बाद दोनों ने आपसी सहमति से प्रकरण समाप्त करवाया। प्रकरण में एडवोकेट सुनीता तिवारी एवं एडवोकेट अमर चौधरी द्वारा पैरवी की गई।
केस नंबर–3 - मासूम बेटे के भविष्य ने रोका तलाक, दंपति फिर एक हुए
माननीय तृतीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश श्री तजिंदर सिंह अजमानी के समक्ष श्रीमती रजनी (परिवर्तित नाम), 28 वर्ष, गृहिणी, वैभव लक्ष्मी नगर, इंदौर एवं संतोष जैन (परिवर्तित नाम), 31 वर्ष, व्यापारी, खाचरौद (म.प्र.) का मामला रखा गया। दोनों का विवाह वर्ष 2021 में परिवार की सहमति से हुआ था। दंपति को एक 3 वर्षीय पुत्र है। विवाह के बाद आपसी सामंजस्य नहीं बन सका। घरेलू विवाद बढ़े और पुत्र के जन्म के समय पति की माता के निधन के बाद स्थिति और बिगड़ गई। पत्नी वर्ष 2024 में मायके चली गई और वर्ष 2025 में विवाह विच्छेद का प्रकरण दायर किया। काउंसलिंग के दौरान न्यायाधीश ने दोनों को वैवाहिक जीवन बचाने और मासूम बेटे के भविष्य की जिम्मेदारी समझाई। इसका सकारात्मक असर हुआ और दोनों पक्ष साथ रहने को तैयार हो गए। लोक अदालत में प्रकरण समाप्त कर दंपति पुत्र सहित साथ रहने चले गए। प्रकरण में एडवोकेट सुनीता तिवारी द्वारा पैरवी की गई।
केस नंबर–4 -भरण-पोषण का केस समाप्त, न्यायालय की पहल से परिवार फिर जुड़ा
माननीय अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश श्री राकेश कुमार जैन के समक्ष श्रीमती पूजा (परिवर्तित नाम), 40 वर्ष, गृहिणी, इंदौर एवं दीपक कुमार सोनी (परिवर्तित नाम), 45 वर्ष, नौकरीपेशा, जूनी इंदौर का मामला प्रस्तुत हुआ। दोनों का विवाह वर्ष 2010 में हुआ था और उनकी एक 6 वर्षीय पुत्री है। शुरुआती जीवन अच्छा रहा, लेकिन बाद में मतभेद बढ़े। पत्नी पुत्री सहित अलग रहने लगी और वर्ष 2024 में भरण-पोषण का प्रकरण दायर किया। न्यायालय में 2-3 बार सुलह वार्ता और काउंसलिंग के बाद स्थिति में सुधार आया। नेशनल लोक अदालत में दोनों पक्ष उपस्थित हुए, प्रकरण समाप्त करवाया और खुशी-खुशी साथ रहने चले गए। इस प्रकरण में एडवोकेट दिनेश तोमर द्वारा पैरवी की गई।