उच्च शिक्षा विभाग के इस फैसले से कॉलेजों को कोर्स स्वीकृति के लिए अब भारी शुल्क नहीं देना पड़ेगा। इसका सीधा लाभ विद्यार्थियों को कम फीस के रूप में मिलेगा। साथ ही रोजगारपरक डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स की संख्या बढ़ने से युवाओं के लिए नए अवसर भी तैयार होंगे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के उद्देश्य से उच्च शिक्षा विभाग ने यह बड़ा फैसला लिया है। पहले विश्वविद्यालय किसी भी डिप्लोमा या सर्टिफिकेट कोर्स की स्वीकृति के लिए कॉलेजों से लगभग 25 हजार से लेकर सवा लाख रुपए तक शुल्क लेते थे। लेकिन अब स्थायी समिति की बैठक में निर्णय लिया गया कि इन कोर्सों की मान्यता महज 1 हजार में दी जाएगी। इस बैठक में अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन, आयुक्त प्रबल सिपाहा और कई विश्वविद्यालयों के कुलगुरु भी मौजूद थे।
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बता दें कि विश्वविद्यालयों द्वारा अधिक स्वीकृति शुल्क लेने का असर सीधे तौर पर विद्यार्थियों की फीस पर पड़ता था। कॉलेज संचालक इस खर्च को कोर्स फीस में जोड़कर छात्रों से वसूलते थे। कई बार कॉलेज अन्य खर्च भी जोड़कर फीस को और बढ़ा देते थे। अब स्वीकृति शुल्क में करीब 99 प्रतिशत तक की कटौती होने से कॉलेजों पर आर्थिक दबाव कम होगा और छात्रों को भी कम फीस में कोर्स करने का अवसर मिलेगा।
फीस कम होने से कॉलेज अधिक संख्या में डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स शुरू कर सकेंगे। इससे विद्यार्थियों को रोजगारपरक शिक्षा हासिल करने का मौका मिलेगा। इन कोर्सों के आधार पर छात्र स्वरोजगार भी शुरू कर सकते हैं। राज्य सरकार ऐसे विद्यार्थियों को स्टार्टअप के लिए लोन उपलब्ध कराने की योजना भी चला रही है। हमीदिया प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस जैसे संस्थानों में कुछ रोजगारमुखी कोर्स पहले ही शुरू किए जा चुके हैं, जिनमें छात्रों ने प्रवेश लेना भी शुरू कर दिया है।