वाशिंगटन। अमेरिकी व्यापार नीति को लेकर जारी एक अहम कानूनी कार्यवाही पर फिलहाल सस्पेंस बरकरार है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लागू किए गए रेसिप्रोकल टैरिफ की वैधता पर अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को भी कोई फैसला नहीं सुनाया। अदालत ने इस मामले में दूसरी बार निर्णय को टाल दिया है, जिससे सरकार, उद्योग जगत और अंतरराष्ट्रीय व्यापार साझेदारों की निगाहें अब भी कोर्ट पर टिकी हुई हैं।
इससे पहले 9 जनवरी को भी सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुरक्षित रखा था। अब इस केस पर अगली सुनवाई कब होगी या निर्णय कब आएगा, इसको लेकर अदालत की ओर से कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया गया है। बुधवार को कोर्ट ने तीन अन्य मामलों में फैसले सुनाए, लेकिन टैरिफ से जुड़े इस संवेदनशील मामले पर न तो कोई बहस हुई और न ही किसी तरह की समयसीमा तय की गई।
यह मामला इस सवाल के इर्द-गिर्द घूमता है कि क्या राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की सीमा से आगे बढ़ते हुए अमेरिका के लगभग सभी बड़े व्यापारिक साझेदार देशों पर 10 से 50 प्रतिशत तक के टैरिफ एकतरफा तौर पर लगा दिए। ट्रंप प्रशासन ने इन टैरिफ को लागू करने के लिए 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का सहारा लिया और अमेरिका के बढ़ते व्यापार घाटे तथा फेंटेनाइल जैसे अवैध ड्रग्स की तस्करी को राष्ट्रीय आपातकाल करार दिया।
दूसरी ओर, डेमोक्रेट शासित 12 अमेरिकी राज्यों और कारोबारियों की ओर से दायर याचिकाओं में इस तर्क को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि IEEPA कानून का उद्देश्य असाधारण आपात स्थितियों से निपटना है, न कि व्यापक और दीर्घकालिक व्यापार नीति लागू करना। उनका दावा है कि टैरिफ तय करने का संवैधानिक अधिकार मुख्य रूप से अमेरिकी कांग्रेस के पास है, न कि राष्ट्रपति के पास।
इससे पहले निचली फेडरल अदालतें ट्रंप सरकार द्वारा लगाए गए कई टैरिफ को अवैध ठहरा चुकी हैं। इन्हीं फैसलों के खिलाफ सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी। नवंबर 2025 में हुई मौखिक सुनवाई के दौरान यह संकेत मिले थे कि रूढ़िवादी और उदारवादी, दोनों ही तरह के जज राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियों की इस व्याख्या को लेकर असहज नजर आ रहे हैं।
अगर सुप्रीम कोर्ट टैरिफ के खिलाफ फैसला देता, तो अमेरिकी सरकार को करीब 130 से 150 अरब डॉलर तक की वसूली गई इंपोर्ट ड्यूटी लौटानी पड़ सकती थी। खुद डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर चेतावनी दी थी कि यदि सरकार यह केस हारती है, तो यह अमेरिका के लिए “आर्थिक आपदा” साबित हो सकती है। फिलहाल, फैसले में हो रही देरी ने इस पूरे मामले को और अधिक अनिश्चित बना दिया है।