इंदौर – भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी से उपजी त्रासदी थमने का नाम नहीं ले रही है। नलों से बह रहा गंदा पानी अब सीधे लोगों की जान ले रहा है, लेकिन इसके बावजूद शासन-प्रशासन हकीकत स्वीकारने को तैयार नहीं है। दूषित पानी के कारण अब तक 20 लोगों की मौत हो चुकी है। मंगलवार को तीन नई मौतों की जानकारी सामने आने के बाद हालात की भयावहता और स्पष्ट हो गई है।
शहर में दूषित पानी से फैल रही बीमारी अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि जानलेवा आपदा बन चुकी है। इसके बावजूद प्रशासनिक तंत्र मौतों को अलग-अलग कारणों से जोड़कर असल सच्चाई से बचने की कोशिश करता नजर आ रहा है। मंगलवार को कुलकर्णी नगर में एक बुजुर्ग महिला की मौत के बाद मौतों का आंकड़ा बढ़कर 18 तक पहुंच गया था, लेकिन प्रशासन ने इस मौत को भी दूषित पानी से जोड़ने से किनारा कर लिया। परिजनों के आरोप, अस्पतालों में भर्ती मरीजों की लंबी कतारें और लगातार सामने आ रही मौतें भी जिम्मेदार अफसरों की नींद नहीं खोल पा रही हैं।
दूषित पानी की इस त्रासदी में श्रावण नथ्थु खुपराव की मौत भी जुड़ चुकी है। 29 दिसंबर को इलाज के दौरान अस्पताल में उनकी मौत हो गई। बेटे श्रीकृष्ण ने बताया कि 25 दिसंबर को उन्हें अचानक उल्टी-दस्त की शिकायत हुई थी। हालत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। 26 दिसंबर को कुछ सुधार हुआ, लेकिन इसके बाद अचानक तबीयत फिर बिगड़ी और उनकी जान चली गई।
श्रावण खुपराव का अंतिम संस्कार महाराष्ट्र के बुलढ़ाना जिले के सेलापुर गांव में किया गया, जो उनका पैतृक गांव है। उनका पोता नगर निगम की पानी की टंकी पर कार्यरत है और बेटा सुरक्षाकर्मी के रूप में काम करता है, इसी कारण पूरा परिवार इंदौर में रह रहा था। सवाल यह है कि जिस परिवार का सदस्य खुद पानी की व्यवस्था से जुड़ा है, वही परिवार दूषित पानी का शिकार बन गया, तो आम जनता की सुरक्षा की गारंटी कौन लेगा?
इसी तरह रामकली पत्नी जगदीश (47 वर्ष) की मौत ने भी प्रशासन के दावों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। उनके बेटे ने बताया कि 28 दिसंबर को अचानक उल्टी-दस्त की शिकायत हुई। परिजन उन्हें इलाज के लिए निजी अस्पताल लेकर पहुंचे, लेकिन इलाज के दौरान ही उनकी मौत हो गई। परिजनों का कहना है कि रामकली को इससे पहले किसी भी तरह की गंभीर बीमारी नहीं थी। अचानक हुई तबीयत खराबी और मौत ने दूषित पानी की भूमिका को और मजबूत कर दिया है।
भागीरथपुरा और आसपास के इलाकों में हालात ऐसे हैं कि हर घर में बीमार लोग मिल रहे हैं। अस्पतालों में बेड भर चुके हैं, स्वास्थ्य केंद्रों पर मरीजों की भीड़ लगी है, लेकिन प्रशासन अब भी मौतों को “स्वाभाविक” या “अन्य कारणों” से जोड़कर अपनी जिम्मेदारी से बचने में लगा है।
आज सवाल यह नहीं है कि मौतें हुई हैं या नहीं, सवाल यह है कि कितनी मौतों के बाद शासन-प्रशासन सच्चाई स्वीकार करेगा? क्या 20 जिंदगियां भी सिस्टम को झकझोरने के लिए काफी नहीं हैं? भागीरथपुरा में बहता दूषित पानी अब सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता का सबसे बड़ा सबूत बन चुका है।