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Dancing Girl Statue :4500 साल पुरानी प्रतिमा पर पाकिस्तान ने भी किया था दावा, बंटवारे में कैसे भारत के पास रह गई यह अनमोल धरोहर?

मोहनजोदड़ो से मिली 4500 साल पुरानी ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा आज भारत की सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक धरोहरों में गिनी जाती है। बंटवारे के समय पाकिस्तान ने इस पर दावा किया था, लेकिन लंबी बातचीत के बाद यह प्रतिमा भारत के हिस्से में आई। जानिए इसके पीछे की पूरी कहानी।
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4500 साल पुरानी प्रतिमा पर पाकिस्तान ने भी किया था दावा, बंटवारे में कैसे भारत के पास रह गई यह अनमोल धरोहर?
सिंधु घाटी सभ्यता की पहचान बन चुकी ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा एक बार फिर चर्चा में है।

सिंधु घाटी सभ्यता की पहचान बन चुकी ‘डांसिंग गर्ल’ प्रतिमा एक बार फिर चर्चा में है। महज 10.5 सेंटीमीटर लंबी यह कांस्य प्रतिमा करीब 4500 साल पुरानी मानी जाती है और इसे दुनिया की सबसे प्रसिद्ध पुरातात्विक खोजों में गिना जाता है। आज यह नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय इस प्रतिमा को लेकर दोनों देशों के बीच लंबा विवाद हुआ था। यह प्रतिमा सिर्फ एक कलाकृति नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास, कला और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।

1926 में मिली थी ‘डांसिंग गर्ल’

ब्रिटिश पुरातत्वविद् अर्नेस्ट मैके को यह प्रतिमा वर्ष 1926 में मोहनजोदड़ो की खुदाई के दौरान मिली थी। उस समय मोहनजोदड़ो अविभाजित भारत का हिस्सा था। बाद में 1947 के विभाजन के बाद यह इलाका पाकिस्तान के सिंध प्रांत में चला गया। यहीं से विवाद की शुरुआत हुई। पाकिस्तान का कहना था कि जिस स्थान से यह प्रतिमा मिली है, वह अब उसके क्षेत्र में आता है, इसलिए इस धरोहर पर उसका अधिकार होना चाहिए। दूसरी ओर भारत ने इसे सिंधु घाटी सभ्यता की साझा विरासत बताया और प्रतिमा को अपने पास रखने की दलील दी।

बंटवारे में धरोहरों का भी हुआ था विभाजन

देश के विभाजन के समय केवल जमीन और सीमाओं का बंटवारा नहीं हुआ था, बल्कि हजारों ऐतिहासिक वस्तुओं को लेकर भी दोनों देशों के बीच चर्चा चली थी। उस दौर में सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी करीब 12 हजार पुरावस्तुएं दिल्ली में मौजूद थीं। इन वस्तुओं को तत्कालीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक और प्रसिद्ध पुरातत्वविद् मॉर्टिमर व्हीलर एक प्रदर्शनी के लिए दिल्ली लेकर आए थे। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने इन सभी वस्तुओं में हिस्सेदारी की मांग की। कई दौर की बातचीत के बाद दोनों देशों के बीच समझौता हुआ कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से मिली पुरावस्तुओं का बंटवारा किया जाएगा।

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डांसिंग गर्ल और प्रीस्ट किंग पर अटक गया मामला

बंटवारे के दौरान सबसे बड़ा विवाद दो ऐतिहासिक प्रतिमाओं को लेकर हुआ। पहली थी कांसे की ‘डांसिंग गर्ल’ और दूसरी पत्थर से बनी प्रसिद्ध ‘प्रीस्ट किंग’ प्रतिमा। वरिष्ठ पुरातत्वविद् और पद्मश्री सम्मानित डॉ. बी.आर. मणि के अनुसार, दोनों देशों के बीच इन प्रतिमाओं को लेकर लंबी चर्चा हुई। पाकिस्तान इन दोनों में से किसी एक प्रतिमा को अपने हिस्से में लेना चाहता था, जबकि भारत भी इन्हें छोड़ने के पक्ष में नहीं था। आखिरकार समझौते के तहत पाकिस्तान को ‘प्रीस्ट किंग’ प्रतिमा दी गई और ‘डांसिंग गर्ल’ भारत के पास रह गई।

क्यों नहीं ले गया पाकिस्तान ‘डांसिंग गर्ल’?

इतिहासकारों के अनुसार, अंतिम चरण में पाकिस्तान के सामने दोनों प्रतिमाओं में से एक चुनने का विकल्प था। माना जाता है कि ‘डांसिंग गर्ल’ एक अर्धनग्न महिला आकृति है, इसलिए पाकिस्तान के कुछ अधिकारियों को आशंका थी कि इसे लेकर धार्मिक और सामाजिक विवाद खड़ा हो सकता है। यही वजह बताई जाती है कि पाकिस्तान ने अपेक्षाकृत कम विवादित मानी जाने वाली ‘प्रीस्ट किंग’ प्रतिमा को अपने हिस्से में लेना बेहतर समझा। इसके बाद ‘डांसिंग गर्ल’ भारत में ही रह गई और आज भी राष्ट्रीय संग्रहालय की हड़प्पा गैलरी की सबसे आकर्षक धरोहरों में शामिल है।

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एनसीईआरटी विवाद के बाद फिर चर्चा में आई प्रतिमा

हाल के दिनों में ‘डांसिंग गर्ल’ तब सुर्खियों में आई जब एनसीईआरटी की एक पुस्तक में इसकी बदली हुई तस्वीर प्रकाशित होने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। आलोचना होने के बाद एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया कि प्रतिमा को उसके मूल स्वरूप में ही प्रकाशित किया जाएगा। इस विवाद के बाद लोगों की दिलचस्पी एक बार फिर इस ऐतिहासिक प्रतिमा और उससे जुड़े इतिहास में बढ़ गई।

सिर्फ मूर्ति नहीं, भारतीय सभ्यता की पहचान है ‘डांसिंग गर्ल’

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रतिमा उस दौर के धातु विज्ञान और कलात्मक कौशल का अद्भुत उदाहरण है। हजारों साल पहले बनी इस मूर्ति से पता चलता है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग कला, शिल्प और धातु निर्माण की उन्नत तकनीकों से परिचित थे। आज ‘डांसिंग गर्ल’ केवल एक पुरातात्विक वस्तु नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक पहचान और विभाजन के दौर की एक महत्वपूर्ण कहानी का हिस्सा भी बन चुकी है।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

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