PlayBreaking News

दुनिया का अनोखा देश !पुलिस भी, जेल भी... लेकिन कैदी एक भी नहीं; जानिए कैसे हुआ ये संभव

पुलिस है, अदालत है, जेल भी हैं... फिर भी कैदी नहीं। यह किसी फिल्म की कहानी नहीं, बल्कि एक असली देश की हकीकत है। जानिए कैसे संभव हुआ यह अनोखा बदलाव।
Follow on Google News
पुलिस भी, जेल भी... लेकिन कैदी एक भी नहीं; जानिए कैसे हुआ ये संभव
AI GENERATED IMAGE

जरा सोचिए, अगर कोई आपसे कहे कि एक ऐसा देश भी है जहां पुलिस भी है, अदालत भी है और बड़ी-बड़ी जेलें भी बनी हुई हैं, लेकिन उनमें कैदी ही नहीं हैं। सुनने में यह किसी फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन यह बिल्कुल सच है। यूरोप का खूबसूरत देश नीदरलैंड आज दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है, जहां अपराध इतने कम हो गए हैं कि कई जेलें खाली पड़ी हैं। यही वजह है कि वहां सरकार को कई जेलें बंद तक करनी पड़ीं। आखिर ऐसा कैसे हुआ? आइए जानते हैं।

अपराध कम हुए तो जेलें भी होने लगीं खाली

नीदरलैंड अपनी खूबसूरती, साफ-सफाई और रंग-बिरंगे ट्यूलिप के फूलों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन इस देश की एक और खास बात है कि यहां अपराधों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में हालात ऐसे बने कि जेलों में कैदियों की संख्या बहुत कम रह गई। कई जेलों में इतने कम कैदी थे कि उन्हें चलाना सरकार के लिए घाटे का सौदा बन गया। इसलिए कई जेलों को बंद कर दिया गया और कुछ इमारतों का दोबारा उपयोग शुरू कर दिया गया।

सिर्फ सजा नहीं, सुधार पर दिया जाता है जोर

नीदरलैंड की सबसे बड़ी खासियत उसकी न्याय व्यवस्था है। यहां सिर्फ अपराधी को जेल भेजना ही मकसद नहीं होता, बल्कि उसे सुधारकर दोबारा समाज का अच्छा नागरिक बनाना भी उतना ही जरूरी माना जाता है। सरकार और अदालतें इस बात पर ज्यादा ध्यान देती हैं कि अपराध करने वाला व्यक्ति अपनी गलती समझे और भविष्य में दोबारा अपराध न करे। इसी सोच की वजह से वहां अपराध भी लगातार कम होते जा रहे हैं।

हर अपराधी को जेल भेजना जरूरी नहीं

नीदरलैंड में छोटे और कम गंभीर अपराध करने वालों को हर बार जेल नहीं भेजा जाता। कई मामलों में अदालत उन्हें इलेक्ट्रॉनिक एंकल मॉनिटर यानी टखने में पहनने वाला ट्रैकिंग डिवाइस लगाकर निगरानी में रहने की अनुमति दे देती है। इस डिवाइस की मदद से पुलिस हर समय उस व्यक्ति की गतिविधियों पर नजर रख सकती है। इससे वह समाज में रहकर नौकरी भी कर सकता है, अपने परिवार की जिम्मेदारी भी निभा सकता है और कानून का पालन भी कर सकता है।

Breaking News

शिक्षा और काउंसलिंग से बदलती है जिंदगी

डच न्याय व्यवस्था का मानना है कि सिर्फ सजा देने से समस्या खत्म नहीं होती। इसलिए वहां अपराधियों को शिक्षा, काउंसलिंग, मनोवैज्ञानिक सहायता और नए कौशल सिखाने पर भी काफी ध्यान दिया जाता है। जब कोई व्यक्ति अपनी सजा पूरी कर लेता है, तो उसे दोबारा सामान्य जीवन जीने के लिए हर संभव मदद दी जाती है। यही वजह है कि वहां दोबारा अपराध करने वालों की संख्या भी काफी कम है।

सरकार के करोड़ों रुपए की होती है बचत

जेल चलाना किसी भी देश के लिए काफी महंगा काम होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, नीदरलैंड में एक कैदी पर हर दिन करीब 25 हजार रुपए तक का खर्च आता है। जब जेलों में कैदी कम हो गए, तो सरकार का खर्च भी काफी कम हो गया। जेलें बंद होने से हर साल करोड़ों रुपए की बचत होने लगी, जिसे सरकार दूसरे जरूरी कामों में खर्च कर सकती है।

ड्रग्स को लेकर भी अलग है कानून

नीदरलैंड में कुछ नशीले पदार्थों को लेकर कानून दूसरे देशों के मुकाबले थोड़ा अलग और लचीला है। इसी वजह से छोटे-मोटे ड्रग्स से जुड़े मामलों में गिरफ्तारियां बहुत कम होती हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि वहां हर तरह के ड्रग्स पूरी तरह कानूनी हैं, लेकिन छोटे मामलों में जेल भेजने के बजाय दूसरे विकल्प अपनाए जाते हैं। इससे भी जेलों में कैदियों की संख्या कम रहने में मदद मिली है।

ये भी पढ़ें: अब बर्थडे भूलना पड़ेगा भारी! WhatsApp ला रहा है ऐसा फीचर, जो खुद दिलाएगा याद

खाली जेलों का हो रहा है नया इस्तेमाल

जब जेलें खाली होने लगीं, तो सरकार ने उन्हें बेकार छोड़ने के बजाय नया रूप देना शुरू कर दिया। कई पुरानी जेलों को शानदार होटल और हॉस्टल में बदल दिया गया। वहीं, कुछ इमारतों का इस्तेमाल स्कूल, अपार्टमेंट, शरणार्थी आवास केंद्र और सामुदायिक सुविधाओं के रूप में किया जा रहा है। इससे इन इमारतों का बेहतर उपयोग भी हो रहा है और सरकार को अलग से नई इमारतें बनाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

खाली जेलों से एक नई परेशानी भी सामने आई

हालांकि, जेलें खाली होने का एक नुकसान भी हुआ। जब कई जेलें बंद हुईं, तो वहां काम करने वाले कर्मचारियों की नौकरियों पर खतरा मंडराने लगा। इस समस्या से निपटने के लिए नीदरलैंड ने एक अनोखा तरीका अपनाया। उसने नॉर्वे जैसे पड़ोसी देशों के साथ समझौते किए और उनके कुछ कैदियों (दोषसिद्ध बंदियों) को अपनी खाली जेलों में रखने की अनुमति दी। इससे जेलों का उपयोग भी होता रहा और कई कर्मचारियों की नौकरियां भी बच गईं।

Sona Rajput
By Sona Rajput

माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से मास कम्युनिकेशन किया है। साल 2022 ...Read More

नई दिल्ली
--°
बारिश: -- mmह्यूमिडिटी: --%हवा: --
Source:AccuWeather
icon

Latest Posts