वंदे मातरम् के सिर्फ 2 अंतरे क्यों गाएगी कांग्रेस, जानिए 9 दशक पुराना प्रस्ताव क्या है?

कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा है कि पार्टी 1937 में तय किए गए फैसले के अनुसार ही वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे गाएगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस फैसले को देशविरोधी बताते हुए उस पर संसद द्वारा बनाए गए कानून की अवहेलना का आरोप लगाया है। कांग्रेस का कहना है कि वंदे मातरम् उसके लिए स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा भावनात्मक विषय है, जबकि बीजेपी इसे राजनीतिक मुद्दा बना रही है। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में इस गीत की रचना की थी, जिसे बाद में आनंद मठ उपन्यास में शामिल किया गया। वंदे मातरम् 1905 से 1908 के स्वदेशी आंदोलन के दौरान प्रमुख नारे के रूप में सामने आया और स्वतंत्रता आंदोलन से गहराई से जुड़ गया। 24 जनवरी 1950 को राजेंद्र प्रसाद ने इसे जन गण मन के साथ समान रूप से सम्मानित किए जाने की बात कही थी।
कांग्रेस ने 1937 के फैसले का दिया हवाला
कांग्रेस कार्यसमिति के फैसले के बाद पार्टी ने साफ किया है कि उसके कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के पहले दो अंतरे ही गाए जाएंगे। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल ने कहा कि पार्टी 1937 में लिए गए अपने फैसले का पालन कर रही है। उनके मुताबिक कांग्रेस करीब 90 साल से इसी तरीके से वंदे मातरम् गाती आ रही है और इसमें उसके लिए कुछ नया नहीं है। उन्होंने बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा था और कांग्रेस के लिए यह भावनात्मक मुद्दा है। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी इस मुद्दे के जरिए दूसरे राजनीतिक सवालों से लोगों का ध्यान हटाना चाहती है।
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अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना
कांग्रेस के फैसले के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी पर तीखा हमला बोला। उन्होंने एक्स पर लिखा कि कांग्रेस कार्यसमिति का वंदे मातरम् के केवल दो अंतरे गाने का फैसला देशविरोधी है और संसद द्वारा बनाए गए कानून की खुली अवहेलना है। अमित शाह ने दावा किया कि 1937 में तुष्टीकरण की राजनीति के तहत कांग्रेस ने वंदे मातरम् के दो हिस्से किए थे। उन्होंने इसे आगे चलकर दो-राष्ट्र सिद्धांत को मजबूती मिलने और देश के विभाजन से भी जोड़ा। बीजेपी की ओर से कांग्रेस के इस फैसले को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं।
बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने वंदे मातरम् गीत की रचना की थी
वंदे मातरम् की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में संस्कृतनिष्ठ बांग्ला में की थी। इसका अर्थ 'मां, मैं तुम्हें नमन करता हूं' माना जाता है और बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'आनंद मठ' में शामिल किया गया। इस उपन्यास की पृष्ठभूमि 18वीं सदी के अंतिम दौर में हुए संन्यासी विद्रोह से जुड़ी थी। ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के शुरुआती दशकों में बंगाल में उसके खिलाफ संन्यासी विद्रोह हुआ था। इसके बाद वंदे मातरम् 1905 से 1908 के स्वदेशी आंदोलन में एक प्रमुख नारे के रूप में गूंजा और धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।
पहले दो अंतरों में मातृभूमि का वर्णन
वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों में मातृभूमि की सुंदरता, उसकी हरियाली, जल और उपजाऊ जमीन का वर्णन किया गया है। राष्ट्रीय गीत के तौर पर पारंपरिक रूप से इस्तेमाल किए जाने वाले संस्करण में भी पहले दो अंतरे ही शामिल हैं। इसी वजह से कांग्रेस अपने कार्यक्रमों में इन्हीं दो अंतरों के गायन की परंपरा का हवाला दे रही है। दूसरी ओर, वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को लेकर हाल के समय में कानूनी और राजनीतिक बहस तेज हुई है। संसद में इसके गायन को जानबूझकर रोकने या इसमें व्यवधान डालने के प्रयासों को अपराध बनाने से जुड़े प्रावधानों के बाद भी यह मुद्दा राजनीतिक बहस का हिस्सा बना हुआ है।
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गोवा में मल्लिकार्जुन खड़गे के कार्यक्रम पर बीजेपी ने उठाए सवाल
वंदे मातरम् को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच विवाद हाल के कार्यक्रमों में भी देखने को मिला है। कांग्रेस के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रम में इसके गायन और बाद में गोवा में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की मौजूदगी में हुए कार्यक्रम को लेकर बीजेपी ने सवाल उठाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी 1937 में कांग्रेस के अधिवेशन में वंदे मातरम् को लेकर लिए गए फैसले पर सवाल उठा चुके हैं। पिछले साल दिसंबर में गीत के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर संसद में बोलते हुए मोदी ने कांग्रेस के उस दौर के फैसलों पर सवाल उठाए थे। वहीं 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि वंदे मातरम् ने भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष में ऐतिहासिक भूमिका निभाई और इसे जन गण मन के साथ समान रूप से सम्मानित किया जाएगा। अब कांग्रेस के ताजा फैसले के बाद राष्ट्रीय गीत को लेकर राजनीतिक बहस फिर तेज हो गई है।





















