संतोष चौधरी,भोपाल। जंगलों का तेजी से सिमटना और अवैध गतिविधियों में बढ़ोतरी ने वन विभाग की चुनौतियों को पहले से कहीं ज्यादा कठिन बना दिया है। अखिल भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक एसआर रावत का मानना है कि आज का दौर वन अधिकारियों के लिए पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल और जोखिम भरा हो गया है।

एसआर रावत बताते हैं कि उनके समय में संसाधन भले ही सीमित थे लेकिन काम करने की स्वतंत्रता और ईमानदारी थी। वे महीने में 12 से 20 दिन तक जंगलों में ही रहते थे और कई बार बैलगाड़ी या पैदल लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। ग्रामीणों के घरों में रहकर ही काम करना पड़ता था। उस समय वन्यजीव संरक्षण के लिए अलग से कोई विशेष विंग नहीं था लेकिन भ्रष्टाचार और राजनीतिक दबाव भी बहुत कम था।
आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। रावत के मुताबिक जंगलों में अवैध खनन, लकड़ी तस्करी और शिकार जैसे अपराधों में माफिया का दखल तेजी से बढ़ा है। वन अमले पर हर घटना की सीधी जिम्मेदारी तय होती है जबकि जमीन पर हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। ऐसे मामलों से निपटना कई बार जान जोखिम में डालने जैसा हो जाता है।
जंगलों के लगातार घटने और इंसानी बस्तियों के विस्तार के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष भी तेजी से बढ़ रहा है। यह संघर्ष अब कई जगहों पर हिंसक रूप ले चुका है जिससे स्थानीय लोगों और वन विभाग के बीच तनाव की स्थिति बन रही है।
आज वन विभाग पर बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट्स का दबाव भी है। कूनो में चीतों के पुनर्वास जैसे प्रोजेक्ट्स ने दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा है लेकिन इससे मैदानी अमले पर जिम्मेदारियां और बढ़ गई हैं।
एसआर रावत नई पीढ़ी के अधिकारियों को स्पष्ट संदेश देते हैं कि वे निडर और ईमानदार रहें। किसी भी तरह के दबाव में आकर गलत फैसले न लें। वे कहते हैं कि वन रक्षक और मैदानी कर्मचारी ही जंगल की असली ताकत हैं, इसलिए उन्हें विश्वास में लेकर काम करना बेहद जरूरी है।
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रावत का मानना है कि जंगलों के आसपास रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के सहयोग के बिना वन संरक्षण संभव नहीं है। उनकी समस्याओं को समझना और समाधान करना ही जंगल बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। यह साफ है कि बदलते समय के साथ वन विभाग की जिम्मेदारियां और चुनौतियां दोनों बढ़ी हैं। ऐसे में मजबूत नीतियां, ईमानदार नेतृत्व और स्थानीय सहयोग ही जंगलों को बचाने की कुंजी बन सकते हैं।