Download App
Download on the App StoreGet it on Google Play
Breaking News

Civil Services Day Special:सिमटते जंगल और बढ़ती माफिया संस्कृति, वन विभाग के सामने नई चुनौतियां

अखिल भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक एसआर रावत का मानना है कि आज का दौर वन अधिकारियों के लिए पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल और जोखिम भरा हो गया है।
सिमटते जंगल और बढ़ती माफिया संस्कृति, वन विभाग के सामने नई चुनौतियां

संतोष चौधरी,भोपाल। जंगलों का तेजी से सिमटना और अवैध गतिविधियों में बढ़ोतरी ने वन विभाग की चुनौतियों को पहले से कहीं ज्यादा कठिन बना दिया है। अखिल भारतीय वन सेवा के वरिष्ठ अधिकारी और पूर्व प्रधान मुख्य वन संरक्षक एसआर रावत का मानना है कि आज का दौर वन अधिकारियों के लिए पहले की तुलना में कहीं ज्यादा जटिल और जोखिम भरा हो गया है।

/img/116/1776699275215

पहले संसाधन कम थे लेकिन दबाव नहीं

एसआर रावत बताते हैं कि उनके समय में संसाधन भले ही सीमित थे लेकिन काम करने की स्वतंत्रता और ईमानदारी थी। वे महीने में 12 से 20 दिन तक जंगलों में ही रहते थे और कई बार बैलगाड़ी या पैदल लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। ग्रामीणों के घरों में रहकर ही काम करना पड़ता था। उस समय वन्यजीव संरक्षण के लिए अलग से कोई विशेष विंग नहीं था लेकिन भ्रष्टाचार और राजनीतिक दबाव भी बहुत कम था।

अब ‘माफिया संस्कृति’ बनी सबसे बड़ी चुनौती

आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। रावत के मुताबिक जंगलों में अवैध खनन, लकड़ी तस्करी और शिकार जैसे अपराधों में माफिया का दखल तेजी से बढ़ा है। वन अमले पर हर घटना की सीधी जिम्मेदारी तय होती है जबकि जमीन पर हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हैं। ऐसे मामलों से निपटना कई बार जान जोखिम में डालने जैसा हो जाता है।

मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ा

जंगलों के लगातार घटने और इंसानी बस्तियों के विस्तार के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष भी तेजी से बढ़ रहा है। यह संघर्ष अब कई जगहों पर हिंसक रूप ले चुका है जिससे स्थानीय लोगों और वन विभाग के बीच तनाव की स्थिति बन रही है।

बढ़ता दबाव और बड़े प्रोजेक्ट्स

आज वन विभाग पर बड़े और अंतरराष्ट्रीय स्तर के प्रोजेक्ट्स का दबाव भी है। कूनो में चीतों के पुनर्वास जैसे प्रोजेक्ट्स ने दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा है लेकिन इससे मैदानी अमले पर जिम्मेदारियां और बढ़ गई हैं।

नए अधिकारियों के लिए संदेश

एसआर रावत नई पीढ़ी के अधिकारियों को स्पष्ट संदेश देते हैं कि वे निडर और ईमानदार रहें। किसी भी तरह के दबाव में आकर गलत फैसले न लें। वे कहते हैं कि वन रक्षक और मैदानी कर्मचारी ही जंगल की असली ताकत हैं, इसलिए उन्हें विश्वास में लेकर काम करना बेहद जरूरी है।

ये भी पढ़ें: राहुल गांधी की दोहरी नागरिकता केस: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज ने खुद को किया अलग, याचिकाकर्ता की पोस्ट पर जताई नाराजगी

ग्रामीणों के सहयोग से ही बचेगा जंगल

रावत का मानना है कि जंगलों के आसपास रहने वाले आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के सहयोग के बिना वन संरक्षण संभव नहीं है। उनकी समस्याओं को समझना और समाधान करना ही जंगल बचाने का सबसे प्रभावी तरीका है। यह साफ है कि बदलते समय के साथ वन विभाग की जिम्मेदारियां और चुनौतियां दोनों बढ़ी हैं। ऐसे में मजबूत नीतियां, ईमानदार नेतृत्व और स्थानीय सहयोग ही जंगलों को बचाने की कुंजी बन सकते हैं।

Dr. Sumit  Shrivastava
By Dr. Sumit Shrivastava

सुमित श्रीवास्तव एक अनुभवी मीडिया प्रोफेशनल, बिजनेस पत्रकार और शोधकर्ता हैं। मास कम्युनिकेशन में M.P...

Latest Posts