जिद पूरी नहीं हुई तो घर छोड़ने लगे बच्चे:मौसी बनी सबसे पसंदीदा रिश्तेदार, लड़कों में चाचा के लिए सबसे ज्यादा लगाव; 5 महीने में 78 मामले सामने आए

पल्लवी वाघेला,भोपाल। शहर में बच्चों के व्यवहार से जुड़ा एक नया और चिंताजनक ट्रेंड सामने आया है। छोटी-छोटी बातों पर नाराज होकर बच्चे घर छोड़ रहे हैं और सीधे उन रिश्तेदारों के पास पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं जिनसे उन्हें सबसे ज्यादा प्यार और अपनापन मिलता है। इनमें सबसे आगे मौसी, नानी, दादी, बुआ और चाचा का नाम सामने आया है। बाल कल्याण समिति (CWC) के आंकड़ों के अनुसार इस साल 15 जून तक भोपाल में कुल 182 बच्चों के घर छोड़ने के मामले दर्ज हुए हैं। इनमें से 78 बच्चे ऐसे थे जो किसी दुर्घटना या अपराध की वजह से नहीं बल्कि अपनी नाराजगी जताने के लिए घर से निकलकर रिश्तेदारों के पास जाने की कोशिश कर रहे थे। औसतन हर महीने ऐसे 15 मामले सामने आ रहे हैं।
माता-पिता की बात न मानने पर बच्चों का नया तरीका
CWC के पास पहुंचे कई बच्चों ने बताया कि जब घर में उनकी बात नहीं मानी जाती या उनकी किसी मांग को पूरा करने से इनकार कर दिया जाता है, तो वे माता-पिता पर दबाव बनाने के लिए अपने पसंदीदा रिश्तेदारों के पास जाने निकल पड़ते हैं। बच्चों को लगता है कि मौसी, नानी, दादी, बुआ या चाचा उनकी बात ज्यादा समझते हैं और उनकी इच्छाएं पूरी करते हैं। यही वजह है कि नाराज होने पर उनका पहला विकल्प अक्सर कोई करीबी रिश्तेदार बन जाता है।
सबसे ज्यादा याद आती है मौसी
पिछले पांच महीनों में रेस्क्यू किए गए बच्चों के मामलों का विश्लेषण करने पर पता चला कि लड़कियों और छोटे बच्चों में सबसे ज्यादा लगाव मौसी के प्रति देखा गया। इसके बाद नानी, दादी और बुआ का स्थान रहा। वहीं लड़कों में चाचा सबसे पसंदीदा रिश्तेदार के रूप में सामने आए। कई बच्चों ने बताया कि चाचा उन्हें डांटते नहीं हैं और उनकी बातों को ध्यान से सुनते हैं।
इन वजहों से बच्चे छोड़ रहे घर
विशेषज्ञों के अनुसार करीब 70% बच्चे गुस्से में घर छोड़ने का फैसला करते हैं। उनकी नाराजगी के पीछे कई वजहें सामने आई हैं।
- मोबाइल इस्तेमाल करने से रोकना
- महंगा मोबाइल या गैजेट खरीदकर न देना
- पसंद के कपड़े न दिलाना
- दोस्तों से बातचीत करने पर रोक लगाना
- सबके सामने डांटना या फटकार लगाना
- रिश्तेदारों या अन्य बच्चों से तुलना करना
- घूमने-फिरने की इच्छा पूरी न होना
- महंगे इलेक्ट्रॉनिक सामान की मांग पूरी न होना
माता-पिता क्या करें
विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को डांटने या उन पर अतिरिक्त दबाव बनाने के बजाय उनके साथ संवाद बढ़ाने की जरूरत है।
- बच्चों की बात ध्यान से सुनें
- उनके साथ ज्यादा समय बिताएं
- दूसरे बच्चों से तुलना करने से बचें
- उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करें
- अनावश्यक दबाव न बनाएं
- प्यार और भरोसे का माहौल तैयार करें
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केस-1: घूमने नहीं ले गए तो मौसी के घर पहुंच गया बच्चा
पिछले महीने आठ साल का एक बच्चा माता-पिता और दोस्तों से अलग-अलग पैसे लेकर घर से निकल गया। जब वह देर रात तक वापस नहीं लौटा तो परिजनों ने पुलिस को सूचना दी। काफी तलाश के बाद भी उसका कोई पता नहीं चला। बाद में रिश्तेदारों से संपर्क किया गया तो मौसी ने फोन कर बताया कि बच्चा उनके पास बीना पहुंच चुका है। पूछताछ में बच्चे ने बताया कि वह इस बात से नाराज था कि उसके माता-पिता उसे गर्मी की छुट्टियों में कहीं घूमाने नहीं ले गए। इसी वजह से वह बिना बताए घर छोड़कर मौसी के घर चला गया।
केस-2: आईफोन की जिद पूरी नहीं हुई तो चाचा के पास पहुंच गया
उत्तर प्रदेश का रहने वाला 12 वर्षीय एक बच्चा अपने माता-पिता से आईफोन दिलाने की मांग कर रहा था। जब उसकी बात नहीं मानी गई तो वह घर से डेढ़ हजार रुपए लेकर भोपाल में नौकरी कर रहे अपने चाचा के पास जाने निकल पड़ा। हालांकि रेलवे स्टेशन पर ही बच्चे को रेस्क्यू कर लिया गया। बाद में उसे उसके चाचा को सौंप दिया गया। बच्चे ने बताया कि उसके चाचा उससे सबसे ज्यादा प्यार करते हैं और उसकी हर इच्छा पूरी करने की कोशिश करते हैं, इसलिए वह उन्हीं के पास जाना चाहता था।
बच्चों को प्यार, भावनात्मक सुरक्षा और समझ की जरूरत
मनोवैज्ञानिक दिव्या दुबे मिश्रा का कहना है कि छोटी उम्र में बच्चों को सबसे ज्यादा प्यार, भावनात्मक सुरक्षा और समझ की जरूरत होती है। जब बच्चों को लगता है कि उनकी भावनाओं को समझा नहीं जा रहा या उनकी बातों को महत्व नहीं दिया जा रहा तब वे उन लोगों की ओर आकर्षित होने लगते हैं जहां उन्हें ज्यादा अपनापन महसूस होता है। उनके अनुसार बच्चा तब घर छोड़ने जैसा कदम उठाता है जब उसे लगने लगता है कि घर में कोई उसकी बात नहीं समझ रहा है। ऐसे में वह मौसी, नानी, दादी, बुआ या चाचा जैसे उन रिश्तेदारों के पास जाना चाहता है जिनके साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव ज्यादा होता है।
बढ़ती घटनाएं दे रही हैं बड़ा संदेश
भोपाल में सामने आए ये मामले केवल बच्चों की जिद नहीं बल्कि परिवार के भीतर संवाद और भावनात्मक जुड़ाव की जरूरत की ओर भी इशारा करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बच्चों की भावनाओं को समय रहते समझा जाए तो ऐसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।












