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बनारस की दालमंडी में कभी गूंजती थी बिस्मिल्ला खां की शहनाई, आज तोड़-फोड़ का शोर

वाराणसी में पुरानी गलियों को तोड़कर सड़क चौड़ी की जा रही है। इससे संगीत से जुड़ी पुरानी विरासतें को खतरा है। शहर के रहवासी इसको लेकर चिंतित हैं। पढ़िए, पीपुल्स रिपोर्टर की खास रिपोर्ट।
बनारस की दालमंडी में कभी गूंजती थी बिस्मिल्ला खां की शहनाई, आज तोड़-फोड़ का शोर
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    रवीन्द्र मिश्र, वाराणसी। बनारस के दालमंडी बाजार में कभी लच्छू महाराज के तबले की थाप, बिस्मिल्ला खां के शहनाई की धुन और निर्मला देवी के गायिकी के सुर गूंजते थे। अब इस दालमंडी का अस्तित्व खत्म होने वाला है। दरअसल,दालमंडी की सकरी सड़क को 17 मीटर तक चौड़ा किया जाना है। इसके लिए मकानों को तोड़ा जा रहा है। इसका उद्देश्य यातायात को सुगम बनाना और क्षेत्र की अव्यवस्था को समाप्त करना है। नगर निगम का कहना है कि यह कार्रवाई जरूरी थी, क्योंकि जर्जर भवनों के कारण क्षेत्र में सुरक्षा का खतरा था। कार्रवाई से पहले भवन स्वामियों को सूचित किया था। 

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    300 साल पुराना इतिहास

    दालमंडी का इतिहास करीब 300 साल पुराना है। कभी इसे साहित्य के गंगोत्री के नाम से जाना जाता था। शाम ढलते ही सुरों और घुंघरुओं की गूंज यहां के कोठों में उठती थी। यहां कई कोठे थे। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से उस वक्त के रईस आते थे। वे तवायफों के नजाकत और नफासत के दीवाने हुआ करते थे। हालांकि यहां की तवायफें सिर्फ अपनी कला बेचती थीं। दालमंडी में कारोबार करने वाले अधिकतर व्यापारी मुस्लिम समुदाय से आते हैं। 

    पुराना नाम डालमंडी था 

    दालमंडी का पुराना नाम डालमंडी था, जो अंग्रेजों ने तवायफों के लिए इस्तेमाल किया था। बाद में दालमंडी प्रचलन में आ गया। प्रख्यात तबला वादक लक्ष्मी नारायण सिंह उर्फ लच्छू महाराज दालमंडी की एक हवेली में रहते थे। फिल्म स्टार गोविंदा की मां निर्मला देवी का जन्म भी दालमंडी में ही हुआ था। गोविंदा का ननिहाल भी दालमंडी में ही था। निर्मला देवी बनारस की एक बड़ी ठुमरी गायिका मानी जाती थीं। दालमंडी का नाम आते ही उस्ताद बिस्मिल्लाह खान का नाम भी जुबां पर आता है। उनकी शहनाई  इन गलियों में गूंजी, जिसने इसे भारतीय संगीत का केंद्र बना दिया।

    चंद्रशेखर आजाद कई बार रुके थे

    यहां की तवायफें आजादी की लड़ाई में भी सहयोगी थीं। उन्होंने कोठों पर स्वतंत्रता सेनानियों को शरण दी, संपत्ति-आभूषण बेचकर आंदोलन के लिए धन जुटाया। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब चंद्रशेखर आजाद अंग्रेजों से बचने के लिए इधर-उधर भाग रहे थे तो कई बार धनेसरी बाई के घर में पनाह लिया करते थे। 

    बदरुद्दीन अहमद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, वाराणसी  

    हमारे लिए बाजार नहीं, रोजी-रोटी की पहचान 

    दालमंडी हमारे लिए केवल एक बाजार नहीं है। यह हमारी रोजी-रोटी, पहचान और जिंदगी है। अगर यह सब खत्म हो गया तो हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा? हम चाहते हैं कि सरकार हमारी बात सुने और हमें उजड़ने से बचाए।

    रईस मियां, कपड़ा व्यापारी 

    पैसे से हम पहचान कैसे खरीदेंगे

    हम 1924 से यहां आभूषणों का व्यापार कर रहे हैं। यह हमारे दादा और पिता की विरासत है। अगर यह खत्म हो गई, तो हमारी जिंदगी का मकसद ही खत्म हो जाएगा।  सरकार कहती है -मुआवजा देगी, लेकिन क्या पैसे से हम पहचान वापस खरीद सकते हैं?

    बाबा सर्राफ, कारोबारी

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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