
प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। शहर में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक ऐसी पहल सामने आई है जिसने खामोशी में टूट रहे लोगों को नई जिंदगी दी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की ‘गेटकीपर’ योजना के तहत तैयार किए गए 445 प्रशिक्षित लोगों ने पिछले दो साल में 16 लोगों को आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम से पहले ही रोक लिया। यह पहल उन घरों तक पहुंची जहां दर्द शब्दों में नहीं बल्कि खामोशी में छिपा था।
मानसिक तनाव और आत्महत्या के बढ़ते मामलों को देखते हुए साल 2024 में गेटकीपर योजना शुरू की गई थी। इसकी पहली ट्रेनिंग भोपाल के पीपुल्स मेडिकल कॉलेज में आयोजित हुई। इस योजना के तहत आशा-ऊषा कार्यकर्ता, कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर और सामाजिक कार्यकर्ताओं को खास ट्रेनिंग दी जाती है ताकि वे अपने आसपास के लोगों में डिप्रेशन और आत्महत्या के संकेत पहचान सकें। ये प्रशिक्षित गेटकीपर घर-घर जाकर लोगों से संवाद करते हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें जिला अस्पताल के मनकक्ष तक पहुंचाते हैं।
इस पहल के तहत कई ऐसे मामले सामने आए जहां समय पर पहचान और काउंसलिंग ने जिंदगी को नया मोड़ दिया। एक मामले में एक महिला अपने पति को लेकर शक के कारण गहरे अवसाद में चली गई थी। हालात इतने बिगड़ गए कि उसने आत्महत्या का मन बना लिया। गेटकीपर की सतर्कता से उसे समय पर काउंसलिंग मिली और अब वह सामान्य जीवन जी रही है। दूसरे मामले में एक बुजुर्ग महिला को अपनी बहू से डर लगने लगा था और वह मानसिक तनाव में आ गई थी। लगातार बातचीत और विशेषज्ञों की मदद से वह भी अब स्वस्थ है।
विशेषज्ञों के मुताबिक अगर किसी व्यक्ति के व्यवहार में अचानक बदलाव दिखे, वह अकेला रहने लगे, हर बात में नकारात्मक सोच आने लगे या नशे की आदत बढ़ जाए तो यह संकेत हो सकते हैं कि उसे मदद की जरूरत है। ऐसे समय में समय पर बातचीत और सही दिशा में मदद बहुत जरूरी होती है।
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देश में आत्महत्या की स्थिति चिंताजनक है। साल 2022 में करीब 1.70 लाख लोगों ने आत्महत्या की यानी हर 184 सेकंड में एक व्यक्ति अपनी जान दे रहा है। मध्यप्रदेश के शहरों की बात करें तो इंदौर और भोपाल जैसे शहरों में भी आत्महत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं जो इस दिशा में ठोस पहल की जरूरत को दिखाते हैं।

एनएचएम के अनुसार यह योजना फिलहाल प्रदेश के 16 जिलों में चल रही है और आगे इसे और विस्तार देने की तैयारी है। खासतौर पर कॉलेज स्टूडेंट्स को इस पहल से जोड़ने की योजना बनाई जा रही है ताकि युवाओं के बीच मानसिक स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता बढ़ सके।
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विशेषज्ञों का कहना है कि आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थिति के रूप में देखना चाहिए। समय पर पहचान, सही काउंसलिंग और संवेदनशील संवाद से कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। भोपाल की यह पहल इसी दिशा में एक मजबूत कदम साबित हो रही है।