भोपाल का स्थापना दिवस : रियासत में हुईं कई शहादतें और गिरफ्तारियां, भूमिगत रहकर आंदोलनकारियों ने विलीनीकरण आंदोलन की गति बनाए रखी

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भोपाल का स्थापना दिवस : रियासत में हुईं कई शहादतें और गिरफ्तारियां, भूमिगत रहकर आंदोलनकारियों ने विलीनीकरण आंदोलन की गति बनाए रखी
भोपाल। 1 जून भोपाल का गौरव दिवस है। साथ ही यह भोपाल के विलीनीकरण की 75वीं वर्षगांठ भी है। हमारा देश 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ। लेकिन भोपाल रियासत ने पृथक अस्तित्व बनाए रखा था। उसका विलय भारतीय गणतंत्र में नहीं हुआ था। आज की पीढ़ी शायद अनभिज्ञ हो कि तत्कालीन भोपाल में राष्ट्रीय तिरंगा करीब 2 साल बाद 1 जून 1949 को फहराया जा सका था। वह भी राज्यव्यापी विलीनीकरण जन-आंदोलन और कई शहीदों की कुर्बानियों के बाद। स्वतंत्रता की बेला में ही सारे देश में बिखरी 584 रियासतों में से अधिकांश सरदार पटेल के प्रयत्न से स्वतंत्र भारत का हिस्सा बन चुकी थीं, पर जिन्ना के बहकावे में जूनागढ़, भोपाल, हैदराबाद, त्रावणकोर आदि कुछ रियासतों का विलय नहीं हुआ था। यह पाकिस्तान के साथ जाना चाहते थे या अपना अलग अस्तित्व बनाए रखना चाहते थे। इन सबकी अगुवाई कर रहे थे जिन्ना के मित्र भोपाल नवाब हमीदुल्ला खां। जिन्हें जिन्ना ने पाकिस्तान का गवर्नर जनरल बनाने का आश्वासन दिया था। हमीदुल्ला खान देसी रियासतों के संगठन चेंबर आॅफ प्रिंसेस के दो बार चांसलर रहे थे, यह संगठन स्वतंत्रता आंदोलन का विरोधी था। भोपाल रियासत हमेशा से विरोधी रहे कई वरिष्ठ नेताओं तक को नवाब अपने प्रभाव ले चुके थे। ऐसे में सरदार पटेल की प्रेरणा से भोपाल रियासत के ही शिक्षित देशभक्त नवयुवकों ने भोपाल को तीसरा पाकिस्तान सदृश्य बनाये रखने की साजिश को नाकाम कर आजाद भारत का अंग बनाने का प्रण किया। विलीनीकरण आंदोलन : भोपाल रियासत के के सर्वाधिक प्रबल आंदोलन, जिसे विलीनीकरण आंदोलन (मर्जर मूवमेंट) के नाम से जाना जाता है का नेतृत्व भाई रतनकुमार और उनके जैसे कई युवाओं ने किया। अधिकांश आंदोलनकारियों को बंदी बना लिये जाने के बावजूद समर्पित आंदोलनकारियों ने भूमिगत रहते हुए तथा महिला संगठनों व बाल संगठनों ने आंदोलन को गतिमान बनाये रखा। (लेखक संस्थापक सचिव, भोपाल स्वातंत्र्य आन्दोलन स्मारक समिति,  भोपाल) 1 जून 1949 को प्रथम विलीनीकरण दिवस पर सबसे पहले राष्ट्रीय तिरंगा रतनकुटी (नई राह कार्यालय) के सामने फहराया गया था। यह चबूतरा व स्तंभ अभी भी जुमेराती में मौजूद है।

बोरास घाट, बरेली में शहीद हुए 6 युवा

भोपाल रियासत में ही बरेली और नर्मदा किनारे स्थित बोरास घाट पर मकर संक्राति के मेले में तिरंगा झण्डा फहराने पर 6 नवयुवकों को नवाबी पुलिस ने सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया। सरदार पटेल को आखिरकार हस्तक्षेप करने का अवसर मिला, जब जाकर भोपाल रियासत का स्वतंत्र भारत में विलीनकरण हो सका। बोरास के शहीदों की रक्त से सनी नर्मदा की रेत को स्थानीय ग्रामीणों द्वारा बैरिकेडिंग द्वारा सुरक्षित रखा गया था। शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए भाई रतन कुमार की नई राह टीम सहित प्रमुख आंदोलनकारी।

विलीनीकरण-आंदोलन के शहीद

बरेली : लाठीचार्ज में 6 जनवरी 49 को
  1. शहीद रामप्रसाद (आयु 28 वर्ष, बरेली)
  2. शहीद जुगराज  (आयु 35 वर्ष, बरेली)
बोरास : गोलीकांड में 14 जनवरी 49 को
  1. शहीद छोटेलाल (आयु 16 वर्ष, स्थान बोरास तह. उदयपुरा)
  2. शहीद धनसिंह (आयु 25 वर्ष, सुल्तानगंज्ञ तह. उदयपुरा)
  3. शहीद मंगलसिंह (आयु 30 वर्ष, बोरास तह. उदयपुरा)
  4. शहीद विशालसिंह (आयु 25 वर्ष, भंबारा तह. उदयपुरा)
रेहटी के शहीद : भोपाल जेल मेें रुग्णावस्था में  7 फरवरी को इन्होंने त्यागे प्राण
  1. शहीद कालूराम (आयु 45 वर्ष; स्थान रेहटी वह मरदानपुर)
अपने खून से सींचने वाले भोपाल रियासत के इन शहीदों को कोई याद तक नहीं करता। (इनपुट - डॉ. आलोक गुप्ता, संस्थापक सचिव, भोपाल स्वतंत्रता आंदोलन स्मारक समिति,  भोपाल, म.प्र.) ये भी पढ़ें- आजादी के बाद भी भोपाल रियासत का विलय न होने से था रोष, नारे लगे थे- नवाब साहब राज छोड़ो
Manisha Dhanwani
By Manisha Dhanwani

मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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