शिक्षा का रिक्शा : किताबों, उम्मीदों और सपनों की क्लास, बच्चों के घर पहुंचता है मूविंग स्कूल

मप्र की राजधानी भोपाल के विजय अय्यर झुग्गियों तक मुफ्त शिक्षा पहुंचा रहे हैं। इंजीनियरिंग पास विजय ने जरूरतमंदों के बीच जागरूकता के लिए यह काम कर रहे हैं। उनका शिक्षा का रिक्शा हर शनिवार और रविवार को शहर के अलग-अलग इलाकों में पहुंचकर बच्चों को पढ़ाता है।
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किताबों, उम्मीदों और सपनों की क्लास, बच्चों के घर पहुंचता है मूविंग स्कूल
रिक्शा के जरिए बच्चों को पढ़ाते भोपाल के विजय

प्रवीण श्रीवास्तव, भोपाल। गरीबी और संसाधनों की कमी अक्सर बच्चों को स्कूल से दूर कर देती है, लेकिन इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके विजय अय्यर पिछले कई वर्षों से गरीब और जरूरतमंद बच्चों में शिक्षा के प्रति जागरुकता फैलाने का काम कर रहे हैं। अब उन्होंने शिक्षा का रिक्शा नाम से एक मूविंग स्कूल तैयार किया है, जो हर शनिवार और रविवार को शहर के अलग-अलग इलाकों में पहुंचकर बच्चों को पढ़ाता है। इस रिक्शे में कॉपी-किताबों के साथ कुर्सियां, टेंट सहित सभी जरूरी सुविधाएं मौजूद हैं। विजय का दावा है कि यह देश का पहला मूविंग स्कूल है। डेढ़ साल में 140 बच्चे उनके स्कूल से जुड़ चुके हैं।

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पहले स्कूटर पर चलती थी क्लास, अब रिक्शा पर

विजय अय्यर ने अपने इस अभियान की शुरुआत छोटे स्तर पर स्कूटर स्कूल से की थी। उस समय वे स्कूटर पर किताबें और सीमित सामान लेकर बच्चों तक पहुंचते थे, लेकिन बच्चों की संख्या बढ़ने और पढ़ाई की जरूरतों को देखते हुए उन्हें बड़े संसाधनों की आवश्यकता महसूस हुई। इसके बाद उन्होंने शिक्षा का रिक्शा तैयार किया। इस काम में कई संस्थाओं ने भी उनका साथ दिया।

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गैरेज से कमाकर बच्चों पर करते हैं खर्च

विजय शिक्षा का रिक्शा चलाने के साथ ही आंगनवाड़ियों को गोद लेकर उन्हे प्ले स्कूल में बदलने का भी काम करते हैं। वे आंगनवाड़ियों में पेंट करने के साथ किताबें और अन्य सामान उपलब्ध कराते हैं। हालांकि इसके लिए उन्हें पैसों की जरूरत होती है। इसके लिए वे खुद गैरेज चलाते हैं। यहां से पैसे इकट्ठे करने के बाद उसे बच्चों पर खर्च करते हैं।

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डेटॉल हैंडवॉश पर आ चुकी है उनकी तस्वीर

कोविड काल में पिता को कोराना पीड़ित होने पर अस्पताल में भर्ती करना पड़ा तो उन्हें कहीं बेड नहीं मिला। वे अपने पिता को स्कूल वैन में बैठाकर कई अस्पतालों के चक्कर लगाते रहे। इसके बाद विजय ने दूसरे मरीजों को भी अस्पताल तक पहुंचाने का काम शुरू कर दिया, इसके साथ हैंड सेनिटाइजेशन और कोरोना से बचने को लेकर प्रचार-प्रसार करने लगे। इस काम की सराहना करते हुए डेटॉल ने अपने हैंडवॉश पर उनका फोटो भी प्रकाशित किया था।

Naresh Bhagoria
By Naresh Bhagoria

नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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