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भोपाल में सांस लेना मुश्किल!जहरीली हवा और घर के एलर्जन ने बढ़ाया खतरा, बच्चों में तेजी से बढ़ रहा अस्थमा; ओपीडी में 30% तक बढ़े मरीज

भोपाल में खराब हवा और घर के एलर्जन से सांस की बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। हर तीसरा मरीज सांस लेने में तकलीफ से जूझ रहा है। बच्चों में अस्थमा के मामले 20 साल में दोगुने हो गए हैं। अस्पतालों की ओपीडी में 30% तक बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जानिए कारण और बचाव के जरूरी उपाय।
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जहरीली हवा और घर के एलर्जन ने बढ़ाया खतरा, बच्चों में तेजी से बढ़ रहा अस्थमा; ओपीडी में 30% तक बढ़े मरीज

भोपाल। राजधानी में लगातार खराब होती हवा और घर के अंदर मौजूद एलर्जन अब लोगों के फेफड़ों पर सीधा असर डाल रहे हैं। हालात ऐसे बन चुके हैं कि अस्पतालों में आने वाला हर तीसरा मरीज सांस लेने में तकलीफ की शिकायत कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चे और युवा भी तेजी से इसकी चपेट में आ रहे हैं।

गांधी मेडिकल कॉलेज के श्वसन रोग विभाग से मिले आंकड़ों के मुताबिक अस्थमा के बढ़ते मामलों के पीछे घर में मौजूद नमी, कॉकरोज और डस्टमाइट सबसे बड़ा कारण है। महिलाएं जहां कॉकरोज और डस्टमाइट के प्रति संवेदनशील होते हैं, वहीं बच्चे प्रिजरवेटिव फूड और लाइफस्टाइल के कारण अस्थमा की चपेट में आ रहे हैं।

आंकड़ों के मुताबिक करीब 20 साल पहले जहां केवल 3% बच्चों में अस्थमा पाया जाता था, अब यह आंकड़ा बढ़कर 7 से 8% तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे सिर्फ बाहरी प्रदूषण ही नहीं, बल्कि घर के अंदर मौजूद कॉकरोच और डस्ट माइट जैसे एलर्जन भी बड़ी वजह बन रहे हैं।

बच्चों में बढ़ रही डिस्ट्रिक्टिव इम्युनिटी

श्वास रोग विशेषज्ञ डॉ. पराग शर्मा बताते हैं कि बीते सालों में बच्चों की आदतों में बदलाव आया है। इसके बच्चों की प्रोटेक्टिव इम्युनिटी लगातार कम हो रही है। प्रोटेक्टिव इम्युनिटी वह होती है जो शरीर को बैक्टीरिया, वायरस और अन्य हानिकारक तत्वों से बचाती है और सही तरीके से काम करती है। इसके

विपरीत डिस्ट्रक्टिव इम्यूनिटी लगातार बढ रही है। इसमें इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर या गलती से शरीर के अपने ही ऊतकों को नुकसान पहुंचाने लगता है। यही कारण है कि एलर्जी, अस्थमा और आॅटोइम्यून बीमारियों में सूजन और तकलीफ बढ़ जाती है।

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गर्मियों में आम तो बारिश में फंगस का हमला

डॉ. पराग शर्मा के मुताबिक तय कारणों के अलावा बच्चों और महिलाओं पर सीजनल राइनो साइनोसाइटिस का असर भी ज्यादा होता है। जिन लोगों को एलर्जी की समस्या है उन्हें ज्यादा तकलीफ होती है। वे बताते हैं कि इन लोगों को गर्मियों में आम को बोर या पराग कणों से परेशानी बढ़ जाती है। इसके साथ ही बारिश में फंगस और सर्दियों में धूल के कणों से तकलीफ बढ़ जाती है।

अस्पतालों में बढ़ गई ओपीडी

बीते पांच सालों में में श्वसन संबंधी मरीजों की संख्या में करीब 30 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। एम्स भोपाल में श्वसन रोगों की ओपीडी में 30% तक वृद्धि हुई है, वहीं हमीदिया अस्पताल में 25 से 30%, जेपी अस्पताल में 20 से 25% और बीएमएचआरसी में करीब 25% मरीज बढ़े हैं। डॉक्टरों का कहना है कि हवा में बढ़ते पीएम 2.5 और पीएम 10 जैसे सूक्ष्म कण फेफड़ों को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहे हैं।

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बचाव के लिए जरूरी कदम

  • बाहर निकलते समय ठ-95 मास्क का उपयोग करें।
  • घर में धूल जमा न होने दें, नियमित सफाई करें।
  • गद्दे, तकिए और पर्दों की सफाई पर ध्यान दें।
  • कॉकरोच और नमी को नियंत्रित रखें।
  • प्रदूषण ज्यादा होने पर बाहर जाने से बचें।
  • बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें।

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प्रदूषण और घर के एलर्जन मिलकर फेफड़ों पर गंभीर असर डाल रहे हैं, समय रहते बचाव और जागरूकता ही सबसे बड़ा समाधान है। दो दशक में बच्चों में अस्थमा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। इनमें खानपान की आदतों के साथ घरेलू कारण भी जिम्मेदार हैं।
- डॉ. लोकेन्द्र दवे, अधीक्षक, आरआईआरडी

Manisha Dhanwani
By Manisha Dhanwani

मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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