इंदौर। भोजशाला विवाद से जुड़े बहुचर्चित मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में बुधवार से सुनवाई शुरू हुई। मामले में विभिन्न पक्षों की ओर से ऐतिहासिक दस्तावेजों, धार्मिक ग्रंथों और पुरातात्विक रिपोर्टों के आधार पर अपने-अपने दावे पेश किए जा रहे हैं। सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष की ओर से अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने विस्तृत तर्क प्रस्तुत करते हुए भोजशाला को प्राचीन सरस्वती मंदिर बताया।
लखनऊ स्थित जन उद्घोष सेवा संस्थान के अध्यक्ष व याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से पेश याचिका में अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने ब्रिटिश काल के 1908 के गजेटियर और वर्ष 1304 में मेरूतुंग द्वारा लिखित ग्रंथों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि वर्तमान में जिसे भोजशाला कहा जाता है, उसे पूर्व में सरस्वतीकंठाभरण और शारदा सदन के नाम से जाना जाता था। अधिवक्ता ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर मामले में अपने निर्णय में ऐतिहासिक पुस्तकों और गजेटियर को सहायक साक्ष्य के रूप में मान्यता दी है, इसलिए इन दस्तावेजों को भी इस मामले में महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।
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सुनवाई के दौरान कहा गया कि वर्ष 1902 में मेहराब के पीछे से जो स्ट्रक्चर निकाला गया, उसे अगर कहीं और ले जाते तो वह यहां पर नहीं मिलते। इसी जगह से भगवान विष्णु की शैया पर लेटे हुए जो मूर्ति मिली है उसे मांडू के म्यूजियम में रखा गया है। वहीं, सरस्वती सदन में जो स्ट्रक्चर देखने को मिलता है उसमें लिखा है कि बसंत पंचमी पर यहां हर साल आयोजन किया जाता है। जहां पर भी मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई है वहीं पर इस तरह के फोटो देखने को मिलते हैं।
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सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने राजा भोज द्वारा रचित ‘समरांगणसूत्रधार’ का उल्लेख करते हुए कहा कि विवादित संरचना उसी वास्तु सिद्धांत के अनुसार निर्मित है। भवन की लंबाई-चौड़ाई का अनुपात 6:4 है, जो इस ग्रंथ में वर्णित मानकों से मेल खाता है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि ग्रंथ के अनुसार मंदिर के मध्य में 9 हस्त का चौकोर हवन कुंड होना चाहिए, जो ईंटों से निर्मित हो। भोजशाला परिसर में पाया गया हवन कुंड इसी विवरण के अनुरूप है, जबकि बाकी संरचना पत्थरों से बनी है। इससे यह संकेत मिलता है कि निर्माण प्राचीन मंदिर पर आधारित है।
अधिवक्ता मनीष गुप्ता ने यह भी दलील दी कि भोजशाला के स्तंभों की आकृति, उन पर उकेरी गई कीर्तिमुख, घंटियां और कमल दल की डिजाइन परमार कालीन मंदिरों से मेल खाती है। ये सभी विवरण ‘समरांगणसूत्रधार’ और अन्य ऐतिहासिक ग्रंथों में वर्णित हैं। मां वाग्देवी की मूर्ति की शैली भी रायसेन और मंदसौर में प्राप्त परमार कालीन प्रतिमाओं से मिलती-जुलती बताई गई, जिससे मंदिर होने के दावे को बल मिलता है।
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बहस के दौरान अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के राम मंदिर फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि एक बार किसी स्थान पर प्राण-प्रतिष्ठा हो जाने के बाद वह स्थान सदा के लिए उसी देवता को समर्पित रहता है और संरचना टूटने से उसका धार्मिक महत्व समाप्त नहीं होता। साथ ही इस्लामिक शरीयत कानून का हवाला देते हुए कहा गया कि अवैध रूप से कब्जा की गई भूमि पर बनी मस्जिद वैध नहीं मानी जाती और वहां अदा की जाने वाली नमाज स्वीकार्य नहीं होती।
सुनवाई में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की सर्वे रिपोर्ट का भी उल्लेख किया गया। अधिवक्ता ने कहा कि हवन कुंड और भवन की नींव में उपयोग हुई ईंटें एक ही स्रोत की प्रतीत होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान संरचना पुराने मंदिर की नींव पर बनी है और खुदाई में सैकड़ों मूर्तियां व शिलालेख मिले हैं। इनमें भगवान ब्रह्मा की युवा अवस्था की प्रतिमा भी शामिल है, जिसका वर्णन ‘समरांगणसूत्रधार’ में मिलता है।