Shivani Gupta
5 Jan 2026
Manisha Dhanwani
5 Jan 2026
इंदौर।
भागीरथपुरा में दूषित पानी से मची तबाही अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं रही, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक और कानूनी पेच में बदलती जा रही है। इलाके में मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता गया, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में सच्चाई सिमटती चली गई। जमीनी हकीकत यह है कि अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि शासन ने हाईकोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में केवल 7 मौतों को ही दूषित पानी से जोड़कर स्वीकार किया है।
कानूनविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ कहना है कि पोस्टमॉर्टम के बिना मौत के कारण को साबित करना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में प्रशासन की यह चूक सिर्फ आंकड़ों की हेराफेरी नहीं, बल्कि पीड़ित परिवारों के अधिकारों पर सीधा कुठाराघात है।
हालत बिगड़ने पर 2 जनवरी को उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया और दो दिन बाद वेंटिलेटर पर रखा गया। तमाम कोशिशों के बावजूद रविवार दोपहर करीब 1 बजे उनकी मौत हो गई। परिजनों के अनुसार, ओमप्रकाश शर्मा केवल ब्लड प्रेशर के मरीज थे और दूषित पानी पीने के बाद ही उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई।
अब तक कुल 398 मरीजों को विभिन्न अस्पतालों में भर्ती किया जा चुका है। इनमें से 256 मरीजों को डिस्चार्ज किया जा चुका है, जबकि 142 मरीजों का इलाज अभी भी जारी है।
क्या बिना पोस्टमॉर्टम कराए अंतिम संस्कार कराने की जल्दबाजी एक चूक थी या फिर सच्चाई को दबाने की कोशिश?
भागीरथपुरा की यह त्रासदी अब सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता और जवाबदेही से बचने की कहानी बनती जा रही है।