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भागीरथपुरा त्रासदी में 17 वी मौत : फाइलों में सिर्फ 7 मौतें दर्ज

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भागीरथपुरा त्रासदी में 17 वी मौत : फाइलों में सिर्फ 7 मौतें दर्ज
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    इंदौर।
    भागीरथपुरा में दूषित पानी से मची तबाही अब सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं रही, बल्कि एक गंभीर प्रशासनिक और कानूनी पेच में बदलती जा रही है। इलाके में मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता गया, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में सच्चाई सिमटती चली गई। जमीनी हकीकत यह है कि अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि शासन ने हाईकोर्ट में दाखिल रिपोर्ट में केवल 7 मौतों को ही दूषित पानी से जोड़कर स्वीकार किया है। बाकी मौतों का सरकारी अस्तित्व इसलिए संदिग्ध बना दिया गया क्योंकि कई पीड़ितों का अंतिम संस्कार बिना पोस्टमॉर्टम कराए ही कर दिया गया। अब यही लापरवाही 12 से ज्यादा परिवारों के लिए सबसे बड़ा अभिशाप बन गई है। बिना पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और ठोस मेडिकल प्रमाण के इन परिवारों के सामने यह सवाल खड़ा हो गया है कि वे मुआवजे का दावा कैसे करेंगे।

    कानूनविदों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का साफ कहना है कि पोस्टमॉर्टम के बिना मौत के कारण को साबित करना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में प्रशासन की यह चूक सिर्फ आंकड़ों की हेराफेरी नहीं, बल्कि पीड़ित परिवारों के अधिकारों पर सीधा कुठाराघात है।  इसी बीच भागीरथपुरा में दूषित पानी से 17वीं मौत की पुष्टि ने हालात और भयावह कर दिए हैं। रिटायर्ड पुलिसकर्मी ओमप्रकाश शर्मा (69), जो मूल रूप से धार जिले की शिव विहार कॉलोनी के निवासी थे, बेटे से मिलने इंदौर आए थे। 1 जनवरी को उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत पर एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। जांच में किडनी खराब होने की पुष्टि हुई।

    हालत बिगड़ने पर 2 जनवरी को उन्हें आईसीयू में शिफ्ट किया गया और दो दिन बाद वेंटिलेटर पर रखा गया। तमाम कोशिशों के बावजूद रविवार दोपहर करीब 1 बजे उनकी मौत हो गई। परिजनों के अनुसार, ओमप्रकाश शर्मा केवल ब्लड प्रेशर के मरीज थे और दूषित पानी पीने के बाद ही उनकी किडनी ने काम करना बंद कर दिया। इसके बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। दूसरी ओर, शहर के बॉम्बे हॉस्पिटल में स्थिति अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। यहां 11 मरीज आईसीयू में भर्ती थे, जिनमें से 4 को हालात में सुधार के बाद वार्ड में शिफ्ट किया गया है। रविवार रात तक 7 मरीज अब भी आईसीयू में जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे।

    अब तक कुल 398 मरीजों को विभिन्न अस्पतालों में भर्ती किया जा चुका है। इनमें से 256 मरीजों को डिस्चार्ज किया जा चुका है, जबकि 142 मरीजों का इलाज अभी भी जारी है।  सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब पूरे इलाके में बीमारी और मौतें एक ही कारण दूषित पानी से जुड़ी दिख रही हैं, तो फिर प्रशासन फाइलों में मौतों का आंकड़ा क्यों घटा रहा है?
    क्या बिना पोस्टमॉर्टम कराए अंतिम संस्कार कराने की जल्दबाजी एक चूक थी या फिर सच्चाई को दबाने की कोशिश?

    भागीरथपुरा की यह त्रासदी अब सिर्फ पानी की नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता और जवाबदेही से बचने की कहानी बनती जा रही है।

     

    Hemant Nagle
    By Hemant Nagle

    हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...Read More

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