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16 मौतों के बाद सियासी लीपापोती: रिपोर्ट नहीं, इमेज बचाने का खेल!

जांच पर ही सवाल: एक ही पानी, तीन लैब… दो में जहर, एक में नहीं !
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16 मौतों के बाद सियासी लीपापोती: रिपोर्ट नहीं, इमेज बचाने का खेल!
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    इंदौर।
    भागीरथपुरा में दूषित पानी से 16 लोगों की मौत के बाद जब इंदौर की राजनीति गरमाई, तो जिम्मेदारी लेने की बजाय सत्ताधारी खेमे में छवि सुधारने की कवायद शुरू हो गई। हालात बिगड़ते देख बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश विजयवर्गीय की छवि को चमकाने के लिए एक सोचा-समझा दांव खेला गया। घटना के बाद से ही पूरे भागीरथपुरा इलाके में पार्षदों और बीजेपी नेताओं का जबरदस्त विरोध हो रहा था। जनता के गुस्से और सवालों से बचने के लिए शनिवार-रविवार को अचानक सोशल मीडिया पर अरविंदो अस्पताल की एक रिपोर्ट इंदौर के व्हाट्सएप ग्रुपों में वायरल कर दी गई। इस रिपोर्ट में पानी की सभी जांच को “नेगेटिव” बताया गया, यानी पानी पूरी तरह सुरक्षित दिखाने की कोशिश की गई।सबसे बड़ा और चौंकाने वाला सवाल यही है कि अगर पानी में कोई बैक्टीरिया था ही नहीं, तो फिर 16 लोगों की मौत किस वजह से हुई? क्या यह मौतें अपने आप हो गईं, या फिर सच्चाई को ढकने के लिए रिपोर्टों का सहारा लिया जा रहा है?

    इंदौर ही नहीं, पूरा प्रदेश जानता है कि अरविंदो अस्पताल के कर्ता-धर्ता वही डॉ. विनोद भंडारी हैं, जिनका नाम पहले भी विवादों में रहा है। कोविड काल में भी मंत्रियों के इशारे पर शहर को गुमराह करने वाले आंकड़े देने के आरोप लग चुके हैं। अब एक बार फिर वही अस्पताल चर्चा में है और सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस रिपोर्ट का मकसद सच्चाई सामने लाना था या फिर राजनीतिक चेहरे की किरकिरी रोकना?

    हैरानी की बात यह है कि जिस रिपोर्ट को सोशल मीडिया पर जमकर प्रचारित किया गया, उसके लिए किसी जिम्मेदार विभाग ने औपचारिक रूप से मांग ही नहीं की थी। इसके बावजूद रिपोर्ट को इस तरह सार्वजनिक किया गया, मानो यह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो।

    वहीं दूसरी ओर, सरकारी लैब की रिपोर्ट साफ-साफ पानी में खतरनाक बैक्टीरिया की पुष्टि कर चुकी है। एमजीएम मेडिकल कॉलेज और नगर निगम की जांच में पानी को जानलेवा बताया गया, लेकिन इन रिपोर्टों को दबाने और निजी लैब की रिपोर्ट को आगे बढ़ाने की कोशिश अब प्रशासन और सत्ताधारी नेताओं की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

    16 मौतों के बाद भी अगर जवाबदेही तय करने की बजाय रिपोर्टों के जरिए लीपापोती की जा रही है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता की आंखों में धूल झोंकने की खुली कोशिश मानी जाएगी।

     

     जांच रिपोर्टों संदेह के घेरे में -


    भागीरथपुरा में दूषित पानी पीने से 16 लोगों की मौत के बाद अब जांच रिपोर्टों ने ही पूरे मामले को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है। जिस पानी ने लोगों की जान ली, उसी पानी के सैंपल जब अलग-अलग लैब में जांच के लिए भेजे गए तो नतीजे चौंकाने वाले निकले। दो सरकारी लैब ने पानी को जानलेवा करार दिया, जबकि एक निजी मेडिकल कॉलेज की लैब ने उसी पानी को “शुद्ध” घोषित कर दिया। भागीरथपुरा में सप्लाई किए गए पानी के सैंपल एमजीएम मेडिकल कॉलेज, नगर निगम की लैब और एक निजी मेडिकल कॉलेज की लैब में जांच के लिए भेजे गए थे। एमजीएम और निगम की लैब रिपोर्ट में पानी में खतरनाक बैक्टीरिया की पुष्टि हुई, लेकिन निजी लैब की रिपोर्ट ने पूरी जांच प्रक्रिया पर ही सवाल खड़े कर दिए।

    इससे पहले स्वयं सीएमएचओ डॉ. माधव हासानी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके हैं कि पानी दूषित है और उसमें जानलेवा बैक्टीरिया पाए गए हैं। इसके बावजूद निजी लैब की रिपोर्ट में पानी को सुरक्षित बताना कई आशंकाओं को जन्म दे रहा है। सैंपल भेजने को लेकर भी प्रशासनिक स्तर पर विरोधाभास सामने आया है। कलेक्टर शिवम वर्मा का कहना है कि सैंपल स्वास्थ्य विभाग द्वारा भेजे गए, जबकि सीएमएचओ डॉ. हासानी ने साफ शब्दों में कहा कि सैंपल उनके स्तर से नहीं भेजे गए। सवाल यह है कि आखिर निजी लैब तक सैंपल किसके निर्देश पर पहुंचे?

    तीन लैब, तीन तस्वीरें

    एमजीएम मेडिकल कॉलेज लैब (1 जनवरी 2025)
    माइक्रोबायोलॉजी लैब की रिपोर्ट में ई-कोलाई, शिगेला जैसे खतरनाक बैक्टीरिया की स्पष्ट पुष्टि हुई।

    नगर निगम लैब (4 जनवरी 2025)
    मूसाखेड़ी स्थित निगम लैब की रिपोर्ट में बोरिंग का पानी भी दूषित पाया गया। जांच में फीकल कोलिफॉर्म बैक्टीरिया की मौजूदगी सामने आई।

    निजी मेडिकल कॉलेज की लैब (4 जनवरी 2025)
    इसी दिन आई रिपोर्ट में किसी भी बैक्टीरिया की पुष्टि नहीं की गई और पानी को पूरी तरह शुद्ध बताया गया।

    अब सवाल सीधा है—
    अगर पानी शुद्ध था, तो 16 लोगों की मौत किस वजह से हुई?
    और अगर पानी दूषित था, तो निजी लैब की रिपोर्ट किस सच्चाई को छिपाने की कोशिश कर रही है?

    जांच के नाम पर यह विरोधाभास न सिर्फ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है, बल्कि उन मौतों के साथ भी गंभीर अन्याय है, जिनकी जिम्मेदारी तय होना अब भी बाकी है।

    Hemant Nagle
    By Hemant Nagle

    हेमंत नागले | पिछले बीस वर्षों से अधिक समय से सक्रिय पत्रकारिता में हैं। वर्ष 2004 में मास्टर ऑफ जर्...Read More

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