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देवबड़ला में खुदाई में मिले परमारकालीन 15 मंदिर, 2 के पुनर्स्थापन का काम पूरा

2016 में पुरातत्व विभाग ने शुरू की थी खुदाई, पहाड़ी पर जगह न होने से की बंद
देवबड़ला में खुदाई में मिले परमारकालीन 15 मंदिर, 2 के पुनर्स्थापन का काम पूरा

अनुज मीणा- भोपाल से करीब 100 किमी दूर सीहोर जिले में आष्टा के पास बसा है बीलपान गांव। इस गांव से तीन किमी दूर है देवबड़ला का जंगली और पहाड़ी इलाका। देवबड़ला में 11वीं सदी के मंदिरों के अवशेष मिल रहे हैं। लोगों ने बताया कि यहां पर नेवज नदी का उद्गम स्थल है, इसलिए लोग यहां पर घूमने के लिए आते हैं। करीब दो दशक पहले आसपास के लोगों ने कुछ खंडित मूर्तियों को देखा था। इसके बाद 2016 से पुरातत्व विभाग की टीम ने यहां पर खुदाई का काम शुरू किया।

करीब एक साल की खुदाई के दौरान यहां पर पहला मंदिर दिखाई दिया था, जिसके बाद कई अवशेष मिलने शुरू हो गए। खुदाई में मिले अवशेषों को पुरातत्व विभाग ने एकत्रित करने का काम शुरू किया और लगातार खुदाई की। अभी तक यहां पर खुदाई में 15 मंदिर मिल चुके हैं, इनमें से दो मंदिरों को कंजर्वेशन वर्क के जरिए पुनर्निर्माण किया जा चुका है।

भूमिजा शैली के मंदिरों के अवशेष मिले

देवबड़ला के मंदिर भूमिजा शैली में बने हुए हैं। इस शैली के मंदिर जमीन से निकलते हुए प्रतीत होते हैं। इसमें शिखर के चारों ओर प्रमुख दिशाओं में लतिन या एकान्डक शिखर की भांति, ऊपर से नीचे तक चैत्यमुख डिजाइन वाले जाल की लताएं रहती हैं।

अब तक खुदाई में मिलीं करीब 50 प्रतिमाएं

देवबड़ला में खुदाई में पुरातत्व विभाग को अभी तक परमार कालीन 11वीं-12वीं शताब्दी के 15 मंदिर मिल चुके हैं, जिनमें से भगवान भोलेनाथ के अलावा अन्य देवी-देवताओं की करीब 50 प्रतिमाएं मिली हैं। इनमें से दो मंदिरों का पुनर्स्थापन कार्य पूरा हो चुका है। इनमें पहला शिव मंदिर है तो वहीं दूसरा विष्णु मंदिर है।

400 साल पूर्व धराशायी हो गए थे मंदिर

पुरातत्व विभाग के अनुसार करीब 400 साल पहले ये मंदिर भूकंप के कारण धराशायी हुए है। उस समय यहां पर आवासीय इलाका होने के साक्ष्य भी मिलते हैं। समय के साथ पहाड़ी इलाके में बारिश और मिट्टी के कटाव के कारण साल दर साल इनके ऊपर मिट्टी की परत जमती चली गई। ये जमीन के नीचे दब गए होंगे।

पुराने मंदिरों का पुनर्स्थापन विधि से करते हैं पुनर्निर्माण

खुदाई में मिले मंदिरों को फिर से उसी स्थिति में बनाने के लिए पहले मलबा सफाई का काम किया जाता है। इसके बाद डॉक्यूमेंटशन कर पता लगाया जाता है पूर्व में मंदिर का स्ट्रक्चर कैसा रहा होगा। गर्भगृह में कौन सी प्रतिमा होगी। गणपति कहां होंगे। इसके बाद पत्थरों पर नंबर डाले जाते हैं, ताकि पता लगाया जा सके कि मंदिर निर्माण में कौन सा पत्थर कहां लगाया जाएगा। इस विधि को कंजर्वेशन या पुनर्स्थापन विधि कहते हैं। -बीके लोखंडे, क्यूरेटर, बिड़ला संग्रहालय

तीसरे और चौथे मंदिर के लिए तैयार की जा रही डीपीआर

देवबड़ला में दो मंदिरों का काम पूरा हो चुका है। अब मंदिर क्रमांक 3 और 4 के पुनर्निर्माण के लिए डीपीआर तैयार की जा रही है। डीपीआर को मंजूरी मिलने के बाद इन मंदिरों में कंजर्वेशन वर्क किया जाएगा। खुदाई में मिले अवशेषों को वहां पर रखने की अब जगह नहीं बची है इसलिए फिलहाल खुदाई बंद कर दी गई है। - रमेश यादव, वरिष्ठ पुरातत्व अधिकारी

People's Reporter
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