आग लगने के बाद ही क्यों याद आती है फायर NOC?जानिए इसे लेना कितना मुश्किल और क्यों बचते हैं बिल्डिंग मालिक

लखनऊ के कोचिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर देशभर में फायर सेफ्टी और फायर एनओसी (नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट) को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। हर बड़े अग्निकांड के बाद यह सवाल उठता है कि संबंधित बिल्डिंग के पास फायर एनओसी थी या नहीं। दिल्ली के मालवीय नगर, मुखर्जी नगर, मुंडका, राजकोट गेमिंग जोन और अब लखनऊ की घटनाओं में भी यही मुद्या सामने आया। ऐसे में लोगो के मन में सवाल है कि आखिर फायर एनओसी लेना कितना कठिन है और बिल्डिंग मालिक इससे बचने की कोशिश क्यो करते हैं?
क्या होती है फायर एनओसी और क्यों है जरूरी?
फायर एनओसी एक ऐसा प्रमाणपत्र है, जो यह साबित करता है कि किसी भवन में आग लगने की स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम मौजूद हैं। यह प्रमाणपत्र राज्य के अग्निशमन विभाग की ओर से जारी किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि भवन में मौजूद लोग आपात स्थिति में सुरक्षित बाहर निकल सकें और आग पर जल्द काबू पाया जा सके। फायर एनओसी सिर्फ एक कागजी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह किसी भी व्यावसाहिक, शैक्षणिक, अस्पताल या बहुमंजिला भवन की सुरक्षा का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।
किन भवनों के लिए अनिवार्य होती है एनओसी?
आमतौर पर 15 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले भवनों के लिए फायर एनओसी जरूरी होती है। हालांकि भवन के उपयोग के आधार पर यह नियम बदल सकते हैं। उदाहरण के लिए होटल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर, सेंटर, स्कूल, कॉलेज और अन्य सार्वजनिक उपयोग वाली बिल्डिंग के लिए अलग-अलग मानक तय किए गए हैं। शैक्षणिक संस्थानों के लिए कम ऊंचाई पर भी फायर एनओसी अनिवार्य हो सकती है, जबकि बड़े व्यावसायिक भवनों और बहुमंजिला परिसरों में यह सबसे जरूरी दस्तावेजों में शामिल होती है।
एनओसी लेने के लिए पूरे करने पड़ते हैं कई सुरक्षा मानक
फायर एनओसी तभी जारी की जाती है जब भवन में आग से बचाव और आपातकालीन निकासी के पर्याप्त इंतजाम हों। इसके लिए अग्निशमन विभाग भवन का निरीक्षण करता है और कई तकनीकी पहलुओं की जांच करता है। भवन में इमरजेंसी एग्जिट, चौड़ी सीढ़ियां, फायर अलार्म सिस्टम, स्मोक डिटेक्टर, अग्निशमन यंत्र, ऑटोमैटिक स्प्रिंकलर सिस्टम, फायर पंप, धुआं निकालने की व्यवस्था और पर्याप्त वेंटिलेशन जैसी सुविधाएं होना जरूरी माना जाता है। इसके अलावा यह भी देखा जाता है कि फायर ब्रिगेड की गाड़ियां भवन तक आसानी से पहुंच सकती हैं या नहीं।
आखिर बिल्डिंग मालिक एनओसी लेने से क्यों बचते हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि कई भवन मालिक फायर एनओसी इसलिए नहीं लेते क्योंकि इसके लिए निर्धारित सुरक्षा मानकों को पूरा करने में अतिरिक्त खर्च आता है। कई पुरानी इमारतों में पर्याप्त निकास मार्ग, फायर सिस्टम या चौड़े कॉरिडोर उपलब्ध नहीं होते। ऐसे में नियमों के अनुसार बदलाव करना महंगा पड़ता है। इसके अलावा एनओसी आवेदन के दौरान भवन की संरचना, सुरक्षा व्यवस्था और संचालन से जुड़ी विस्तृत जानकारी देनी होती है। अगर किसी भवन में नियमों के अनुरूप सुविधाएं नहीं हैं तो उसे एनओसी नहीं मिलती। इसी वजह से कई संचालक इस प्रक्रिया से बचने की कोशिश करते हैं।
ये भी पढ़ें: Amarnath Yatra: अमरनाथ यात्रा से पहले जम्मू में अलर्ट, किरायेदारों का वेरिफिकेशन कर रही पुलिस
आवेदन में पूछे जाते हैं कई अहम सवाल
फायर एनओसी के लिए आवेदन करते समय भवन की ऊंचाई, मंजिलों की संख्या, बेसमेंट की स्थिति, सड़क की चौड़ाई, निकास मार्ग, सीढ़ियों का आकार, अग्निशमन उपकरणों की संख्या, स्प्रिंकलर सिस्टम और बिजली बैकअप जैसी कई जानकारियां देनी पड़ती हैं। अग्निशमन विभाग यह भी जांचता है कि भवन में आग फैलने से रोकने के क्या इंतजाम हैं और किसी आपात स्थिति में लोगों को कितनी जल्दी सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है।
हादसों के बाद जागता है सिस्टम
देश में पिछले कुछ वर्षों में हुए कई बड़े अग्निकांडों की जांच में फायर एनओसी की कमी या सुरक्षा मानकों में लापरवाही सामने आई है। लखनऊ कोचिंग अग्निकांड के बाद भी प्रशासन ने कई कोचिंग संस्थानों और व्यावसायिक भवनों की जांच शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि फायर एनओसी को केवल एक औपचारिकता नहीं समझना चाहिए। यह दस्तावेज लोगों की जान बचाने से सीधे जुड़ा हुआ है। यदि भवन मालिक समय पर सुरक्षा मानकों का पालन करें और नियमित निरीक्षण कराएं तो कई बड़े हादसों को रोका जा सकता है। लखनऊ की घटना ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि आग लगने के बाद सवाल पूछने से बेहतर है कि सुरक्षा इंतजाम पहले से सुनिश्चित किए जाएं। फायर एनओसी केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि मानव जीवन की सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी है।












