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Vrindavan:बांकेबिहारी मंदिर में पहली बार टूटी परंपरा, बाल भोग में डेढ़ घंटे की देरी

ठाकुर श्री बांकेबिहारी मंदिर, वृंदावन में 15 दिसंबर को एकादशी के दिन बाल भोग में देरी की वजह से हलचल मच गई। मंदिर में रोजाना चार भोग की परंपरा है, लेकिन सुबह लाला का बाल भोग समय पर नहीं पहुंचा। देरी का कारण पिछला भुगतान न होने के कारण हलवाई का भोग बनाने से इंकार करना था। बाद में भुगतान की व्यवस्था कर बाल भोग करीब डेढ़ घंटे बाद मंदिर में अर्पित किया गया।
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बांकेबिहारी मंदिर में पहली बार टूटी परंपरा, बाल भोग में डेढ़ घंटे की देरी
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    मथुरा। ठाकुर श्री बांकेबिहारी मंदिर, वृंदावन में एकादशी के दिन भोग की परंपरा में देरी देखी गई। मंदिर में रोजाना चार भोग लगाए जाते हैं लेकिन 15 दिसंबर को सुबह लाला का बाल भोग समय पर नहीं पहुंचा, जिससे मंदिर परिसर में हलचल मच गई।

    बाल भोग में देरी का कारण

    मंदिर में भोग तैयार कराने की जिम्मेदारी मयंक गुप्ता के पास है। वे हलवाई से भोग बनवाकर सेवायतों को देते हैं। सोमवार को जब बाल भोग समय पर नहीं आया, तो सेवायतों ने स्थिति का पता लगाया। उन्होंने देखा कि हलवाई ने भोग नहीं बनाया क्योंकि पिछला भुगतान अभी तक कमेटी द्वारा नहीं किया गया था।

    कमेटी के सदस्य ने बताया कि सैलरी के कारण हलवाई ने भोग बनाने से इंकार कर दिया। बाद में बातचीत करके भुगतान की व्यवस्था कराई गई और करीब डेढ़ घंटे बाद बाल भोग मंदिर में लगाया गया।

    मंदिर में नियमित भोग की व्यवस्था

    ठाकुर श्री बांकेबिहारी मंदिर में भोग की परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है। रोज़ाना चार बार भोग अर्पित किया जाता है:

    • सुबह: बाल भोग
    • दोपहर: राजभोग
    • शाम: उत्थापन भोग
    • रात: शयन भोग

    कमेटी को लेकर भी चल रहा विवाद

    सुप्रीम कोर्ट ने इस साल अगस्त में मंदिर प्रबंधन के लिए एक हाई पावर कमेटी बनाई थी। लेकिन गठन के बाद से ही कमेटी को लेकर विवाद चलता रहा है। 15 दिसंबर की घटना से साफ है कि भोग की समय पर व्यवस्था और कमेटी की पारदर्शिता अभी पूरी तरह से सुनिश्चित नहीं हुई है।

    मंदिर के सेवायतों का कहना है कि भोग की नियमित परंपरा मंदिर की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। उनका कहना है कि किसी भी प्रकार की देरी श्रद्धालुओं और मंदिर के माहौल पर असर डालती है। इसलिए उन्होंने कमेटी से भोग के लिए समय पर भुगतान और व्यवस्थापन सुनिश्चित करने की मांग की है।

    मंदिर प्रबंधन ने स्पष्ट किया है कि अब भोग की तैयारी और वितरण में कोई व्यवधान नहीं आने दिया जाएगा। कमेटी के आदेश से मयंक गुप्ता और हलवाई को निर्देश दिए गए हैं कि वे समय पर भोग तैयार कर सेवायतों को दें। मंदिर प्रशासन ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाने का वादा किया है।

    कृष्ण भगवान को बांके बिहारी क्यों बोलते हैं?

    बांके बिहारी कृष्ण का ही एक अवतार हैं और उनके इस नाम के पीछे एक पौराणिक कथा मिलती है। ऐसा माना जाता है कि स्वामी हरिदास जी के अनुरोध करने पर भगवान कृष्ण ने यह रूप लिया था और उनके इस रूप को स्वामी हरिदास जी ने ही बांके बिहारी नाम दिया। कहते हैं कि भगवान कृष्ण के इस विग्रह रूप के जो भी दर्शन करता उसकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं।

    Garima Vishwakarma
    By Garima Vishwakarma

    गरिमा विश्वकर्मा | People’s Institute of Media Studies से B.Sc. Electronic Media की डिग्री | पत्रकार...Read More

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