लाइफस्टाइल डेस्क। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में शुगर-फ्री शब्द हेल्थ का पर्याय बन चुका है। वजन कम करना हो, डायबिटीज कंट्रोल करनी हो या फिटनेस ट्रेंड फॉलो करना हो... लोग बिना सोचे-समझे शुगर-फ्री प्रोडक्ट्स को अपनी डेली डाइट में शामिल कर रहे हैं। डाइट सोडा, प्रोटीन पाउडर, फ्लेवर्ड योगर्ट, शुगर-फ्री बिस्किट और चॉकलेट… ये लिस्ट खत्म होने का नाम नहीं लेती।
लेकिन सवाल यह है कि, क्या चीनी से दूरी बनाकर हम वाकई सेहत की ओर बढ़ रहे हैं? या फिर अनजाने में किसी और खतरे को न्योता दे रहे हैं?
हाल ही में प्रकाशित एक नई इंटरनेशनल स्टडी ने आर्टिफिशियल स्वीटनर्स को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिसर्च के मुताबिक, इनका ज्यादा और लंबे समय तक सेवन ब्रेन हेल्थ, खासकर याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है।
अक्टूबर 2025 में American Academy of Neurology के मेडिकल जर्नल में एक अहम स्टडी प्रकाशित हुई। यह रिसर्च ब्राजील में की गई, जिसमें 12,772 लोगों को शामिल किया गया। इन प्रतिभागियों की औसत उम्र करीब 52 साल थी और इन्हें लगभग 8 साल तक मॉनिटर किया गया।
रिसर्च का तरीका
इस स्टडी में कुल 7 आर्टिफिशियल स्वीटनर्स की जांच की गई, जिनमें शामिल थे:
रिसर्च में सामने आया कि, जो लोग नियमित रूप से ज्यादा मात्रा में आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का सेवन कर रहे थे, उनमें-
विशेषज्ञों के मुताबिक, यह गिरावट ऐसी थी जैसे दिमाग अपनी असली उम्र से करीब 1.6 साल ज्यादा बूढ़ा हो गया हो।
साफ संकेत है कि, चीनी के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे ये स्वीटनर्स, लंबे समय में ब्रेन हेल्थ के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं।
आर्टिफिशियल स्वीटनर ऐसे केमिकल या प्रोसेस्ड पदार्थ होते हैं, जिन्हें चीनी की जगह मिठास देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ये आमतौर पर शुगर-फ्री फूड, डाइट ड्रिंक्स, लो-कैलोरी प्रोडक्ट्स में मिलाए जाते हैं।
इनकी मुख्य विशेषताएं
इन्हीं खूबियों की वजह से डायबिटिक और वेट-लॉस करने वाले लोग इन्हें सेफ मानकर इस्तेमाल करने लगे।
नई स्टडीज के अनुसार, आर्टिफिशियल स्वीटनर्स का असर सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक सेवन करने से कई और हेल्थ प्रॉब्लम्स का खतरा बढ़ सकता है।
संभावित हेल्थ रिस्क-
नोट: कुछ आर्टिफिशियल स्वीटनर्स ब्लड शुगर न बढ़ाने के बावजूद इंसुलिन स्पाइक कर सकते हैं।
चीनी
आर्टिफिशियल स्वीटनर
पहले इन्हें चीनी का हेल्दी विकल्प माना गया, लेकिन अब वैज्ञानिक मानने लगे हैं कि लंबे समय तक इनका सेवन नई समस्याएं पैदा कर सकता है।
अक्सर लोग यह मान लेते हैं कि लो-कैलोरी मतलब हेल्दी, जो हमेशा सही नहीं है।
अगर इंग्रीडिएंट लिस्ट में ये नाम दिखें, तो समझ लें कि उसमें आर्टिफिशियल स्वीटनर है:
भारत में FSSAI समेत कई इंटरनेशनल फूड एजेंसियों ने इन स्वीटनर्स को मंजूरी दी थी, क्योंकि शुरुआती रिसर्च में इन्हें सुरक्षित माना गया।
लेकिन पिछले एक दशक में सामने आई नई स्टडीज इनके लॉन्ग-टर्म इफेक्ट्स पर सवाल उठा रही हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि, अब उपलब्ध सबूत हमें सावधान रहने की सलाह देते हैं।
आर्टिफिशियल स्वीटनर की जगह सीमित मात्रा में ये विकल्प अपनाए जा सकते हैं-
ये नेचुरल होने के साथ कुछ पोषक तत्व भी देते हैं।
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