संडे पॉजिटिव:गांव के हुनर को मिला ग्लोबल बाजार, ₹200 रोज से ₹2000 तक पहुंची कमाई; टेराकोटा और बांस उद्योग को मिली नई पहचान

मप्र विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (मेपकास्ट) की पहल ने गांवों में छिपे हुनर को नई उड़ान दी है। जो कारीगर पहले सीमित बाजार और कम आय में काम कर रहे थे आज वही अपने उत्पाद देश ही नहीं बल्कि विदेशों तक बेच रहे हैं। राजधानी के पास औबेदुल्लागंज में शुरू किए गए ट्रेनिंग सेंटर ने हजारों ग्रामीण कलाकारों और उद्यमियों की जिंदगी बदल दी है। यहां कारीगरों को डिजाइन, पैकेजिंग और मार्केटिंग के आधुनिक तरीके सिखाए गए जिससे उनके उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ी। नतीजा यह हुआ कि जो लोग पहले महीने में मुश्किल से कुछ हजार रुपए कमा पाते थे वे आज हर महीने 50 से 70 हजार रुपए तक कमा रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं बल्कि आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की नई कहानी भी लिख रहा है।

टेराकोटा कला को मिला नया बाजार, देश-विदेश तक पहुंच
मेपकास्ट ने टेराकोटा और मिट्टी कला से जुड़े कारीगरों को आधुनिक तकनीक और बाजार की जरूरतों से जोड़ने के लिए सीजीसीआरआई के नरोडा केंद्र का विजिट कराया। यहां कलाकारों को डिजाइन इनोवेशन, प्रोडक्ट डाइवर्सिटी और ग्राहक की पसंद के अनुसार उत्पाद तैयार करने की ट्रेनिंग दी गई। इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रदर्शनियों के जरिए उन्हें अपने उत्पाद बेचने के अवसर भी मिले। अब ये कारीगर न सिर्फ खुद का बड़ा बिजनेस कर रहे हैं बल्कि अन्य राज्यों में जाकर ट्रेनिंग भी दे रहे हैं।
संपूर्ण इकोसिस्टम से जोड़कर बना रहे सफल उद्यमी
मेपकास्ट की खासियत यह है कि वह सिर्फ ट्रेनिंग तक सीमित नहीं है।
- डिजाइन एक्सपर्ट्स के जरिए पारंपरिक कला में आधुनिकता जोड़ना
- ब्रांडिंग और पैकेजिंग सिखाना
- ऑनलाइन मार्केटिंग के गुर देना
- राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मेलों में भागीदारी का मौका देना
- वित्तीय प्रबंधन और उद्यमिता कौशल सिखाना
इन सभी पहलुओं के जरिए कारीगरों को एक मजबूत बिजनेस मॉडल दिया जा रहा है जिससे वे लंबे समय तक आत्मनिर्भर रह सकें।
हेमंत प्रजापति: ₹200 रोज से ₹8 लाख सालाना तक का सफर
टेराकोटा कलाकार हेमंत प्रजापति की कहानी इस बदलाव की सबसे बड़ी मिसाल है। पहले वे पारंपरिक मिट्टी के बर्तन बनाकर रोजाना 100-200 रुपए ही कमा पाते थे। 2008 में मेपकास्ट से जुड़ने के बाद उन्होंने 2012 में महाराष्ट्र के भद्रावती में विशेष ट्रेनिंग ली। आज उनकी सालाना आय 7 से 8 लाख रुपए तक पहुंच गई है। उन्हें दो राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिल चुके हैं और वे सोहागपुर में खुद का टेराकोटा वर्कशॉप और ट्रेनिंग सेंटर चला रहे हैं।
- आदिवासी शैली के बर्तन
- पेन स्टैंड, मोबाइल स्टैंड
- लैंप और फ्लावर पॉट
- ब्लैक और रेड फायरिंग टेराकोटा ज्वैलरी

5 साल में 9 राज्यों के 6000 से ज्यादा कारीगरों को दी ट्रेनिंग
हेमंत प्रजापति अब तक मध्यप्रदेश के अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, झारखंड, लखनऊ, पुणे, गोवा और दिल्ली समेत 9 राज्यों में 6000 से अधिक कारीगरों को ट्रेनिंग दे चुके हैं। उनके प्रशिक्षित कई कारीगर आज प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना के तहत मास्टर ट्रेनर बन चुके हैं या अपना खुद का बिजनेस चला रहे हैं।

बांस उद्योग ने बदली हेमराज मेश्राम की जिंदगी
बांस (बेम्बू) उद्योग भी गांवों में रोजगार का बड़ा जरिया बनकर उभरा है। कारीगर हेमराज मेश्राम पहले बांस के बर्तन और साधारण फर्नीचर बनाकर महीने में करीब 5 हजार रुपए कमाते थे। मेपकास्ट के बेम्बू मिशन से जुड़ने के बाद उनकी आय 50 से 60 हजार रुपए महीने तक पहुंच गई। आज वे बड़े शहरों और रिसॉर्ट्स के लिए हट, सोफा, कुर्सियां और आकर्षक फर्नीचर तैयार कर रहे हैं।
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500 से ज्यादा लोगों को दी ट्रेनिंग, 100 ने शुरू किया बिजनेस
हेमराज अब तक गुवाहाटी, औरंगाबाद सहित कई जगहों पर ट्रेनिंग दे चुके हैं। उनके माध्यम से 500 से अधिक लोग ट्रेनिंग ले चुके हैं जिनमें से 100 से ज्यादा लोग सफलतापूर्वक अपना बिजनेस चला रहे हैं। इस उद्योग में महिलाओं की भागीदारी भी तेजी से बढ़ी है जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है।
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तकनीक और नवाचार से गांवों को मिल रही नई दिशा
मेपकास्ट के महानिदेशक डॉ. अनिल कोठारी के अनुसार औबेदुल्लागंज का ट्रेनिंग सेंटर युवाओं को तकनीकी दक्षता और नवाचार से जोड़ने का केंद्र बन रहा है। इसका उद्देश्य ऐसे स्टार्टअप तैयार करना है जो सामाजिक और औद्योगिक समस्याओं का समाधान कर सकें।












