कानपुर से एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने हर माता-पिता और छात्र को सोचने पर मजबूर कर दिया है। 16 साल की वैशाली सिंह ने सिर्फ इसलिए अपनी जिंदगी खत्म कर ली, क्योंकि उसे उम्मीद से कम नंबर मिले। 92% जैसे शानदार अंक भी उसके लिए खुशी नहीं, बल्कि बोझ बन गए।
वैशाली ने हाईस्कूल में 92 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। आमतौर पर यह किसी भी छात्र के लिए गर्व की बात होती है, लेकिन वैशाली का लक्ष्य 95% से ज्यादा था।जब रिजल्ट आया, तो वह अंदर ही अंदर टूट गई। बाहर से सब सामान्य दिख रहा था, लेकिन उसके मन में निराशा गहराती जा रही थी। रिजल्ट के बाद से ही वह चुप और उदास रहने लगी थी।
खुदकुशी से पहले वैशाली ने अपने दोस्तों को एक वॉयस रिकॉर्डिंग भेजी। उसकी आवाज में दर्द साफ महसूस हो रहा था। उसने कहा- अब मुझसे जिया नहीं जाएगा… मैं एक जिंदा लाश बन गई हूं… मां मुझ पर इतना पैसा खर्च कर रही हैं, कहीं उनका पैसा बर्बाद न हो जाए… ये शब्द बताते हैं कि वह कितने गहरे मानसिक दबाव में थी।
गुरुवार को मां काम पर गई हुई थीं। उन्होंने दोपहर से शाम तक कई बार बेटी को फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। चिंता होने पर उन्होंने बेटे प्रिंस को कमरे में भेजा। जैसे ही प्रिंस ने दरवाजा खोला, सामने बहन का शव फंदे पर लटका हुआ था। यह दृश्य देखकर वह चीख पड़ा। कुछ ही पलों में पूरा घर मातम में बदल गया।
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वैशाली के पिता की दो साल पहले मौत हो चुकी है। मां काजल एक मॉल में नौकरी करके परिवार चला रही हैं। भाई प्रिंस ने भी कुछ साल पहले पढ़ाई छोड़ दी थी। ऐसे में परिवार की उम्मीदें वैशाली से जुड़ी थीं। लेकिन अब वही उम्मीद हमेशा के लिए टूट गई।
मां और भाई का आरोप है कि स्कूल में वैशाली पर पढ़ाई का काफी दबाव डाला जा रहा था। भाई प्रिंस के मुताबिक, टीचर्स अक्सर उसकी तुलना उससे करते थे और कहते थे- तुम प्रिंस की बहन हो, तुम्हारे अच्छे नंबर नहीं आएंगे। यह बात वैशाली को अंदर तक चोट पहुंचाती थी। वह खुद को साबित करना चाहती थी, और उसने 92% अंक लाकर यह कर भी दिखाया, लेकिन शायद खुद से संतुष्ट नहीं हो पाई।
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परिवार के अनुसार, वैशाली लंबे समय से तनाव में रहने लगी थी। वह देर रात तक पढ़ाई करती थी और खुद पर बहुत ज्यादा दबाव डाल रही थी। उसे डर था कि अगर वह उम्मीद पर खरी नहीं उतरी, तो मां की मेहनत और पैसा बेकार हो जाएगा।
घटना की सूचना मिलते ही पुलिस और फॉरेंसिक टीम मौके पर पहुंची। छात्रा का मोबाइल फोन कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी गई है। शुरुआती जांच में तनाव को ही आत्महत्या की वजह माना जा रहा है। एक सवाल जो हर किसी को सोचने पर मजबूर करता है।
क्या 92% नंबर सच में कम होते हैं? या फिर हम बच्चों पर उम्मीदों का इतना बोझ डाल देते हैं कि वे खुद को असफल समझने लगते हैं?
वैशाली की कहानी सिर्फ एक खबर नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है कि बच्चों को नंबर से ज्यादा समझ और सहारा चाहिए। अगर समय रहते उनकी भावनाओं को समझा जाए, तो शायद कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।