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किसान या केंद्रीय मंत्री?99 लाख की सब्सिडी ने छेड़ी नई बहस, अपने ही मंत्रालय से मदद लेने पर घिरे भागीरथ चौधरी; जानें सफाई में क्या बोले

केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को खीरे की खेती के लिए 99 लाख रुपए की सरकारी सब्सिडी मिलने पर विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष ने हितों के टकराव का आरोप लगाया है, जबकि मंत्री ने कहा कि उन्होंने सभी सरकारी नियमों का पालन किया है। जानिए पूरा मामला, योजना और मंत्री की सफाई।
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99 लाख की सब्सिडी ने छेड़ी नई बहस, अपने ही मंत्रालय से मदद लेने पर घिरे भागीरथ चौधरी; जानें सफाई में क्या बोले
केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी (फाइल फोटो)

नई दिल्ली। क्या सरकार की कृषि सब्सिडी योजनाओं का लाभ केवल छोटे किसानों के लिए है, या फिर सार्वजनिक पदों पर बैठे लोग भी इनका समान रूप से लाभ उठा सकते हैं? केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को उनके निजी खीरे की खेती परियोजना के लिए 99 लाख रुपए की सब्सिडी मिलने के बाद यही सवाल राजनीतिक और सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है। विपक्ष इसे हितों के टकराव (Conflict of Interest) का मामला बता रहा है, जबकि मंत्री का कहना है कि उन्होंने पूरी प्रक्रिया सरकारी नियमों के तहत पूरी की है।

क्या है पूरा मामला?

एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को राजस्थान के पुष्कर के पास स्थित उनके निजी कृषि प्रोजेक्ट के लिए 99 लाख रुपए की सब्सिडी स्वीकृत की गई। यह सहायता केंद्र सरकार की 'मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर' (MIDH) योजना के तहत मिली, जिसका संचालन नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड (NHB) करता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि 16,592 वर्ग मीटर क्षेत्र में विकसित उनके खीरे की खेती वाले प्रोजेक्ट को वर्ष 2025 में स्वीकृति दी गई थी। यह योजना व्यावसायिक बागवानी और आधुनिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से चलाई जाती है।

सब्सिडी योजना कैसे करती है काम?

MIDH योजना के तहत किसानों को आधुनिक तकनीक, संरक्षित खेती, सिंचाई व्यवस्था और व्यावसायिक बागवानी को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय सहायता दी जाती है। इस योजना का संचालन नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड करता है, जो कृषि मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करता है। योजना का उद्देश्य उच्च मूल्य वाली फसलों का उत्पादन बढ़ाना और किसानों की आय में सुधार करना है।

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विपक्ष ने उठाए हितों के टकराव के सवाल

मामला सामने आने के बाद विपक्ष ने सरकार को घेरते हुए सवाल उठाए कि जिस मंत्रालय के अधीन यह योजना चलती है, उसी मंत्रालय के राज्य मंत्री को इतनी बड़ी सब्सिडी मिलना नैतिक रूप से उचित है या नहीं। विपक्ष का कहना है कि, भले ही प्रक्रिया नियमों के अनुसार पूरी हुई हो, लेकिन सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ऐसी योजना का लाभ लेना हितों के टकराव की स्थिति पैदा करता है। उनका आरोप है कि इससे सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं।

भागीरथ चौधरी ने क्या दी सफाई?

विवाद बढ़ने के बाद भागीरथ चौधरी ने स्पष्ट किया कि वे सबसे पहले एक किसान हैं और वर्षों से खेती करते आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी जमीन उनके नाम पर है और उन्होंने पूरी परियोजना सरकार की निर्धारित गाइडलाइंस के अनुसार तैयार की।

मंत्री के मुताबिक, परियोजना के लिए उन्होंने करीब 2 करोड़ रुपए का बैंक ऋण लिया है। उन्होंने फार्म पर चार बड़े जलाशय (फार्म पूल) बनवाए हैं, जिनमें करीब 2 करोड़ लीटर वर्षा जल संग्रहित किया जा सकता है। इसी पानी से लगभग 60 बीघा क्षेत्र में आधुनिक खेती की जा रही है।

उन्होंने कहा कि सब्सिडी लेने में कुछ भी छिपाया नहीं गया। खेत पर सूचना बोर्ड भी लगाया गया है, जिसमें परियोजना की लागत और मिली सब्सिडी का पूरा विवरण दर्ज है ताकि दूसरे किसान भी आधुनिक खेती के लिए प्रेरित हो सकें।

'हर किसान को मिलनी चाहिए ऐसी सुविधा'

भागीरथ चौधरी का कहना है कि यदि कोई किसान निर्धारित शर्तें पूरी करता है तो उसे भी इस योजना का लाभ मिल सकता है। उन्होंने कहा कि यूरिया, डीएपी और अन्य कृषि इनपुट पर भी सरकार किसानों को सब्सिडी देती है। इसी तरह यह योजना भी पात्र किसानों के लिए उपलब्ध है। उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान में भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। ऐसे में वर्षा जल संरक्षण और आधुनिक तकनीक आधारित खेती भविष्य की आवश्यकता है और उनका प्रोजेक्ट इसी दिशा में एक मॉडल है।

नैतिक बहस क्यों तेज हुई?

हालांकि मंत्री का कहना है कि पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से सही है, लेकिन कई विशेषज्ञ इसे नैतिक दृष्टि से अलग नजरिए से देख रहे हैं। कृषि मामलों के जानकारों का मानना है कि, सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों को ऐसी योजनाओं का लाभ लेने से पहले हितों के टकराव की संभावना पर भी विचार करना चाहिए। उनका कहना है कि, इससे आम लोगों के बीच यह संदेश जा सकता है कि प्रभावशाली लोगों की सरकारी योजनाओं तक पहुंच अधिक आसान होती है।

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योजना पर नहीं, पारदर्शिता पर बहस

यह विवाद केवल 99 लाख रुपए की सब्सिडी तक सीमित नहीं है। चर्चा इस बात पर भी है कि क्या सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही के मानक पर्याप्त हैं। अगर सभी प्रक्रियाएं नियमों के तहत हुई हैं तो उन्हें सार्वजनिक रूप से और अधिक पारदर्शी तरीके से सामने रखा जाना चाहिए, ताकि किसी तरह की शंका की गुंजाइश न रहे।

फिलहाल क्या स्थिति है?

अब तक मंत्री की ओर से यही कहा गया है कि सब्सिडी पूरी तरह नियमों के तहत मिली है और किसी प्रकार का नियम उल्लंघन नहीं हुआ। वहीं विपक्ष इस मामले को नैतिकता और सरकारी जवाबदेही से जोड़कर लगातार सवाल उठा रहा है। अगर भविष्य में कृषि मंत्रालय, नेशनल हॉर्टिकल्चर बोर्ड या अन्य संबंधित एजेंसियों की ओर से कोई नया स्पष्टीकरण या आधिकारिक बयान आता है, तो उससे इस मामले की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।

Manisha Dhanwani
By Manisha Dhanwani

मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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