मध्यप्रदेश के पवित्र शहर उज्जैन में इन दिनों आस्था की एक अनोखी धारा बह रही है। 118 किलोमीटर लंबी पंचकोशी यात्रा 12 अप्रैल से शुरू हो चुकी है, लेकिन श्रद्धालुओं का उत्साह ऐसा है कि लोग दो दिन पहले ही शहर में पहुंचने लगे। हर गली, हर रास्ता बस हर हर महादेव के जयघोष से गूंज रहा है। यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मशक्ति और विश्वास की परीक्षा भी मानी जाती है।
पंचकोशी यात्रा की शुरुआत पटनी बाजार स्थित श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर से होती है। यहां श्रद्धालु सबसे पहले भगवान को नारियल अर्पित करते हैं और यात्रा सफल बनाने के लिए शक्ति मांगते हैं।
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मान्यता है कि यहां से उधार का बल लेकर यात्री आगे बढ़ते हैं। कहा जाता है कि इस मंदिर में पूजा करने से यात्रियों को घोड़े जैसी ताकत मिलती है, जिससे वे कठिन यात्रा पूरी कर पाते हैं।
हर साल इस यात्रा में करीब 2 से 3 लाख लोग शामिल होते हैं। इस बार भी इंदौर, बड़नगर, इंगोरिया और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं। कुछ लोग पहली बार इस यात्रा का हिस्सा बने हैं, तो कई ऐसे भी हैं जो वर्षों से लगातार इस परंपरा को निभा रहे हैं। उनके लिए यह सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि जीवन का एक जरूरी अध्याय है।
यह यात्रा वैशाख महीने में की जाती है, जिसे हिंदू धर्म में बेहद पवित्र माना गया है। शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास का महत्व माघ और कार्तिक महीने के बराबर होता है। इस महीने में दान, स्नान और पूजा का विशेष फल मिलता है। ऐसा माना जाता है कि जो लोग पूरे महीने धार्मिक कार्य नहीं कर पाते, वे इस पंचकोशी यात्रा में शामिल होकर या अंतिम 5 दिनों में स्नान करके भी पुण्य प्राप्त कर सकते हैं। पुराणों में भी वैशाख महीने में स्नान और तप के महत्व का वर्णन मिलता है।
उज्जैन को महाकाल की नगरी कहा जाता है, जहां महाकालेश्वर मंदिर स्थित है। यह शहर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। मान्यता है कि इस नगरी में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास है। जीवन में हर देवता के दर्शन करना संभव नहीं होता, लेकिन इस शहर की परिक्रमा करने से सभी देवी-देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हो जाता है।
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पंचकोशी यात्रा में श्रद्धालु 5 प्रमुख शिव मंदिरों की परिक्रमा करते हैं। ये मंदिर चारों दिशाओं में स्थित हैं और इन्हें भगवान शिव के द्वारपाल कहा जाता है-
इन सभी मंदिरों की कुल दूरी करीब 118 किलोमीटर है, जिसे श्रद्धालु पैदल तय करते हैं।
यात्रा के दौरान श्रद्धालु क्षिप्रा नदी में स्नान करते हैं। यह स्नान आत्मशुद्धि और पापों से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है। भीषण गर्मी में यह पैदल यात्रा करना आसान नहीं होता, लेकिन इसे तपस्या के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि इस कठिन सफर से शरीर और मन के विकार भी दूर होते हैं।
यह यात्रा 17 अप्रैल 2026 तक चलेगी और अमावस्या के दिन इसका समापन होगा। यात्रा पूरी करने के बाद श्रद्धालु फिर से नागचंद्रेश्वर मंदिर पहुंचते हैं और भगवान को मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं। यह प्रतीक होता है उस बल को वापस लौटाने का, जो उन्होंने यात्रा की शुरुआत में भगवान से मांगा था।