वॉशिंगटन डीसी। मिडिल ईस्ट में जारी ईरान बनाम अमेरिका इजरायल का युद्ध अब एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। ईरान में शीर्ष नेतृत्व और 40 से ज्यादा अधिकारियों की मौत के बाद जहां अमेरिका को शुरुआत में यह जंग बड़ी सफलता लग रही थी, लेकिन यूद्ध के 17 दिन बाद हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। अब न तो युद्ध का कोई स्पष्ट अंत नजर आ रहा है और न ही हालात काबू में दिखाई दे रहे हैं।
ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्ग होर्मुज स्ट्रेट से तेल आपूर्ति रोक दी है। इस फैसले का असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है, क्योंकि दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से होती है। सप्लाई बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में चिंता बढ़ गई है।
हालांकि भारत इस मामले में काफी भाग्यशाली माना जा रहा है, क्योंकि ईरान ने भारत जाने वाले दो तेल कंटनरों को परमिशन दे दी है। जिस वजह से देश तेल के साथ ही जरूरी LPG सिलेंडर की जरूरत को जुटा पाया है।
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इस बीच डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों से इस समुद्री रास्ते को खुलवाने में मदद मांगी है। उन्होंने खासतौर पर NATO देशों से अपील की है कि वे अपने युद्धपोत भेजकर स्थिति को सामान्य करें। हालांकि, ट्रम्प की इस अपील को यूरोपीय देशों ने सिरे से खारिज कर दिया है। जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति को तगड़ा झटका दिया है। इससे साफ है कि नाटो देश इस युद्ध में अपना न्यूट्रल पक्ष रखना चाहते हैं। हालांकि यह फैसला पर ट्रंप कैसे रिएक्ट करते हैं और क्या टिप्पणी करते हैं ये देखना बेहद ही दिलचस्प होगा।
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जर्मनी ने साफ कहा है कि वह किसी सैन्य कार्रवाई में हिस्सा नहीं लेगा। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने दो टूक कहा कि इस तरह के किसी मिशन पर कोई सहमति नहीं बनी है, इसलिए जर्मनी की भागीदारी का सवाल ही नहीं उठता। वहीं रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने भी अमेरिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह यूरोप का युद्ध नहीं है।
ब्रिटेन ने भी इस मुद्दे पर दूरी बना ली है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने कहा कि उनका देश इस संघर्ष में नहीं फंसेगा। हालांकि उन्होंने यह जरूर माना कि होर्मुज स्ट्रेट को खोलना जरूरी है, लेकिन इसके लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति जरूरी होगी।
इसी तरह इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने भी सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक समाधान पर जोर दिया है। उनका कहना है कि मौजूदा यूरोपीय मिशन रक्षा और समुद्री सुरक्षा तक सीमित हैं, उन्हें युद्ध में नहीं बदला जा सकता।
इतना ही नहीं यूरोपीय यूनियन समेत फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने भी अपने युद्धपोत भेजने से इनकार कर दिया है। कुल मिलाकर, अमेरिका के दबाव के बावजूद उसके सहयोगी देश इस टकराव से दूरी बना रहे हैं। ऐसे में होर्मुज स्ट्रेट का संकट और गहराता जा रहा है, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।