Aniruddh Singh
15 Jan 2026
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में अमेरिकी निवेश फर्म टाइगर ग्लोबल के खिलाफ निर्णय सुनाते हुए कहा कि फ्लिपकार्ट में हिस्सेदारी बेचने से हुए मुनाफे पर भारत में टैक्स देना होगा। यह मामला वर्ष 2018 का है, जब टाइगर ग्लोबल ने अपनी मॉरीशस स्थित इकाइयों के जरिए फ्लिपकार्ट में लगभग 1.6 अरब डॉलर की हिस्सेदारी अमेरिकी रिटेल दिग्गज वॉलमार्ट को बेची थी। यह सौदा वॉलमार्ट द्वारा फ्लिपकार्ट के करीब 16 अरब डॉलर के अधिग्रहण का हिस्सा था। इस फैसले का मतलब यह है कि टैक्स बचाने के लिए बनाए जटिल ढांचों को भारत स्वीकार नहीं करेगा। टाइगर ग्लोबल ने भारत-मॉरीशस टैक्स संधि का सहारा लेकर यह दावा किया था कि उसे इस सौदे पर भारत में कोई टैक्स नहीं देना चाहिए।
भारतीय कर अधिकारियों ने इसे टैक्स से बचने की रणनीति बताया और इस पर आपत्ति जताई। अब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के रुख को सही ठहराते हुए कहा है कि यह लेनदेन अनुचित टैक्स बचाव व्यवस्था के तहत किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी सौदे की संरचना का मुख्य उद्देश्य टैक्स से बचना हो, तो उसे वैध नहीं माना जा सकता। इसलिए टाइगर ग्लोबल को इस सौदे से हुए लाभ पर टैक्स देना होगा। हालांकि, अभी टैक्स और संभावित जुमार्ने की राशि कितनी होगी यह अभी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनी ने इस सौदे से वास्तविक लाभ कितना कमाया है।
यह फैसला केवल टाइगर ग्लोबल तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका व्यापक असर भविष्य में भारत में होने वाले सीमा-पार निवेश सौदों पर पड़ेगा। विदेशी निवेशकों के लिए यह एक मजबूत संदेश है कि भारत अब टैक्स संधियों की व्याख्या ज्यादा सख्ती से करेगा और केवल कागजी या कृत्रिम ढांचों के जरिए टैक्स छूट का लाभ उठाने की अनुमति नहीं देगा। कर विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला भारतीय कर व्यवस्था में एक अहम मोड़ है। अब निवेशकों पर यह जिम्मेदारी होगी कि वे यह साबित करें कि उनके सौदे वास्तविक कारोबारी जरूरतों पर आधारित हैं, न कि केवल टैक्स बचाने के इरादे से किए गए हैं। कुल मिलाकर, यह निर्णय भारत की कर नीति को ज्यादा पारदर्शी और सख्त बनाता है, भले ही इससे कुछ विदेशी निवेशक अल्पकाल में सतर्क हो जाएं।