पीपुल्स टीम। होली के त्योहार पर अलग-अलग अंचलों की होली मनाने की परंपराएं आज भी कायम है। महाकोशल में इस पर्व परंपरा के साथ आधुनिक रूप भी देखने को मिल जाएगा तो बुंदेलखंड में पारंपरिक होली पूरे उत्साह के साथ मनाई जाती है।
महाकोशल और विंध्य के इन जिलों में होली आधुनिक रंगों और डीजे से अलग, प्रकृति और लोकजीवन से जुड़ी परंपराओं के साथ मनाई जाती है। यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत को संजोए रखने का माध्यम भी है। अंचल के आदिवासी बहुल जिलों—शहडोल, अनूपपुर, उमरिया, बालाघाट, मंडला, डिंडौरी और सीधी में होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति, प्रकृति और सामुदायिक एकता का जीवंत उत्सव है। गोंड, बैगा, कोल और अगरिया समुदायों की परंपराएं यहां होली को विशिष्ट पहचान देती हैं।
जिले के ब्यौहारी, जैतपुर और सोहागपुर क्षेत्र के गांवों में होली से एक सप्ताह पहले ही फाग गूंजने लगती है। मांदल और ढोल की थाप पर युवक-युवतियां करमा नृत्य करते हैं। यहां टेसू (पलाश) के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग आज भी परंपरा का हिस्सा है। होलिका दहन के बाद नए अनाज की बालियों की पूजा कर समृद्धि की कामना की जाती है।
पुष्पराजगढ़ और कोतमा क्षेत्र में महिलाएं समूह बनाकर पारंपरिक फाग गाती हैं। दूसरे दिन गांव-गांव फाग यात्रा निकलती है। घर-घर से अनाज एकत्र कर सामूहिक भोज की परंपरा आज भी कायम है।
पाली और मानपुर क्षेत्र के बैगा गांवों में होली से पहले जंगल देवता की पूजा की जाती है। महिलाएं गोल घेरा बनाकर नृत्य करती हैं, जबकि पुरुष मांदर (मांदल) बजाते हैं। यहां महुआ से बने पेय का पारंपरिक महत्व है।
लांजी, बैहर और परसवाड़ा क्षेत्र में रातभर लोकगीतों और नृत्य का आयोजन होता है। ‘माटी होली’ की परंपरा में खेत की पवित्र मिट्टी से प्रतीकात्मक रंग लगाया जाता है।
नर्मदा तट के गांवों में बैगा और गोंड समुदाय सुआ और रीना गीत गाते हैं। यहां प्राकृतिक रंगों और सामूहिक नृत्य की परंपरा प्रमुख है।
समनापुर और करंजिया क्षेत्र में होली पर करमा और शैला नृत्य का विशेष आयोजन होता है। पूरी रात ढोल-नगाड़ों की गूंज रहती है। ग्रामीण इसे सामाजिक मेल-मिलाप और पुराने विवाद भुलाने का अवसर मानते हैं।
सीधी जिले में कोल जनजाति के गांवों में ढोल की थाप पर फाग गाई जाती है। होलिका दहन के बाद युवक गांवभर घूमकर पारंपरिक गीत गाते हैं और सामूहिक भोज का आयोजन करते हैं।
बुंदेलखंड के कई गांवों में लट्ठमार होली के साथ मटका फोड़ने का खेल भी होता है। पूरे अंचल में होली का त्योहार केवल रंगों तक सीमित नहीं, बल्कि लोक कथाओं, गायन और अनूठी लोक रीतियों से सराबोर है। छतरपुर, टीकमगढ़ व महोबा क्षेत्र में एक दिन कीचड़ की होली का भी रिवाज है। होलिका दहन से रंगपंचमी तक गांव-चौपालों पर फाग-गीत, लोक-संगीत और लोक-नृत्य चलते रहते हैं। यहां टेसू के फूलों, गुलाल और घरेलू ढंग से बने प्राकृतिक रंगों का उपयोग होता है।
कई गांवों में हर घर अपनी छोटी-सी होलिका जलाता है, नई अग्नि लाकर परंपरा निभाता है, जबकि गोशालाओं की रक्षा के लिए दरवाजों पर गोबर से बने सूरज- चांद और तारे बांधे जाते हैं, जो बुंदेलखंड की होली की एक दुर्लभ लोक-परंपरा है।
होली के साथ में फाग का अपना महत्व रहा है। लोक कवि ईसुरी की श्रृंगार रस वाली फागें (चोकड़िया फाग) सबसे लोकप्रिय हैं’ गांव की चौपालों पर नगड़िया -ढोलक , झींका, मंजीरा, की लय पर फाग की तान अब कम सुनाई पड़ती है।
झांसी जिले के एरच को होलिका दहन की जन्मस्थली माना जाता है, जहां हिरण्यकश्यप के महल के अवशेष और होलिका-प्रहलाद की मूर्तियां मिली थीं।
रंगो के उत्सव के उल्लास और हुड़दंग के बीच श्योपुर के आदिवासी विकासखंड कराहल के बमोरी गांव में आस्था का मेला भी लगेगा। वहां धुलेंडी के दिन गल देवता के मेले का आयोजन होगा। इसमें भील-भिलाला और पटेलियाओं के 35 गांव के लोग जुटेंगे और अपनी विभिन्न मन्नतों और लोक गीतों के साथ लोक देवता दलबाबा की पूजा-अर्चना करेंगे। साथ ही वहां मांगी गई मन्नत पूरी होने वाले लोगों को 30 फीट ऊंची मचान से गल (झूला) भी झुलाया जाएगा। जो लोगों के आकर्षण का खास केंद्र रहेगा, क्योंकि इस झूले को 30 फीट ऊंची मचान से व्यक्ति को रस्सी बांधकर घुमाते हुए झुलाया जाता है। खास बात यह है कि यह आयोजन धुलेंडी के दिन होता है और इस अवसर पर यहां पर बड़ी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ती है। जो रंग-बिरंगे कपड़ों में सज-धजकर पूरी तरह से आस्था के सरोबार में रहकर भगवान से मन्नत मांगने और पूरी होने पर श्रद्धानुसार चढ़ोतरी करने का काम करते हैं। इस दौरान भील-भिलालाओं द्वारा पारंपरिक गीत-संगीत पर किया जाने वाला नृत्य भी लोगों के आकर्षण का खास केंद्र रहता है।
कराहल से 10 किमी दूर बमोरी गांव स्थित है। इस स्थान को लेकर मान्यता है कि यहां लोक देवता गलदेव विराजते हैं। उनका धरती और आसमान दोनों पर राज है। इसलिए वहां आकर मन्नत मांगने पर बीमारी से लेकर हर तरह की मन्नत पूरी होती है। लोग मन्नत मांगने और पूरी होने पर झूले में झूलते हैं।
भील-भिलाला और पटेलियाओं में इस त्योहार के 7 दिन पहले से होली का उत्सव शुरू हो जाता है। बमोरी के दिलीप सिंह बताते हैं कि उनके गांवों में होली के लिए युवाओं की टोलियों का पहले से ही गठन हो जाता है, जो घर-घर जाकर लोगों के साथ होली खेलते हुए उनको शुभकामनाएं देते हैं। धुलेंडी के दिन तो सिर्फ लोक देवता पर आस्था और बाबा की भक्ति में लोक गीत पर नृत्य आदि के कार्यक्रम होते हैं।
इंदौर में रंगपंचमी पर निकलने वाली गेर का इतिहास अपने आप में अनोखा है। इंदौरियों में होली से ज्यादा उत्साह गेर को लेकर देखा जाता है। यह परंपरा इंदौर के होलकर रियासत काल से चली आ रही है। इंदौर में गेर की शुरूआत लगभग 300 साल पहले होलकर राजवंश के शासनकाल में हुई थी। यह परंपरा रंगपंचमी के दिन राजा और प्रजा द्वारा मिलकर होली खेलने और भाईचारा बढ़ाने के लिए शुरू की गई थी, जो अब रंगपंचमी पर राजवाड़ा क्षेत्र में निकाली जाने वाली एक विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक जुलूस बन गई है।
टोरी कार्नर गेर संयोजक अभिमन्यु मिश्रा के अनुसार, इस आयोजन ने सामाजिक एकजुटता को मजबूत किया है। इस वर्ष गेर में डीजे, भजन मंडली, रंग-बिरंगी गुलाल उड़ाने वाली आधुनिक मशीनें और पानी के टैंकर की विशेष व्यवस्था की गई है। सांप्रदायिक सौहार्द और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 100 से अधिक सुरक्षाकर्मियों और वालंटियर तैनात किए जा रहे हैं।
रंगपंचमी की गेर के दौरान बिना किसी औपचारिक निमंत्रण के लाखों लोग राजवाड़ा चौक पर एकत्र होते हैं। इसमें महिलाएं, बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी शामिल होते हैं। पिछले पांच वर्षों से विदेशी पर्यटक भी गेर का नजारा देखने पहुंच रहे हैं। गेर को विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, जिनमें सफलता की उम्मीद जताई जा रही है।