हिंदू धर्म में होलाष्टक को अशुभ समय माना जाता है। इस दौरान शादी-विवाह, सगाई, मुंडन, नामकरण जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं। माना जाता है कि होलाष्टक में किए गए कार्य शुभ फल नहीं देते।
पंचक कुल पांच दिनों का समय होता है। इस दौरान किसी भी प्रकार का शुभ काम नहीं किया जाता। खासकर लकड़ी से जुड़े काम, घर की छत बनवाना और लकड़ी इकट्ठा करना वर्जित माना जाता है। पंचक हर महीने आता है और इसके पांच प्रकार होते हैं— मृत्यु पंचक, अग्नि पंचक, रोग पंचक, चोर पंचक और नृप पंचक।
जब सूर्य धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तब खरमास लगता है। इस अवधि में विवाह, सगाई और अन्य मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। मान्यता है कि खरमास में किए गए शुभ कार्यों का फल नहीं मिलता।
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पितृपक्ष 16 दिनों तक चलता है और यह पितरों को समर्पित होता है। इस समय श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक पितृपक्ष रहता है। इस दौरान किसी भी शुभ कार्य के साथ-साथ नए कपड़े और गहने खरीदना भी वर्जित माना जाता है।
सूर्य और चंद्र ग्रहण के समय सूतक काल लगता है। सूतक काल शुरू होने से लेकर ग्रहण समाप्त होने तक कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। इस दौरान देवी-देवताओं की मूर्तियों को छूने की भी मनाही होती है। सूर्य ग्रहण का सूतक 12 घंटे पहले और चंद्र ग्रहण का सूतक 9 घंटे पहले शुरू हो जाता है।
चातुर्मास में भी सभी मांगलिक कार्य बंद रहते हैं। यह आषाढ़ शुक्ल की देवशयनी एकादशी से शुरू होकर कार्तिक शुक्ल की देवउठनी एकादशी तक चलता है। धार्मिक मान्यता है कि इन चार महीनों में भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं, इसलिए इस समय शुभ कार्य नहीं किए जाते।