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1358 करोड़ की योजना पर बहस :पर्यावरण, स्थानीय स्रोत और शहर की बढ़ती प्यास के बीच संतुलन का सवाल

स्थानीय लोगों का कहना है कि नर्मदा का पानी आने के बावजूद दबाव (pressure) कम रहता है, जिससे ऊंचाई वाले इलाकों में पानी नहीं पहुंच पाता।
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पर्यावरण, स्थानीय स्रोत और शहर की बढ़ती प्यास के बीच संतुलन का सवाल
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    शैलेन्द्र वर्मा, इंदौर। इंदौर की प्यास बुझाने के लिए नर्मदा पर बढ़ती निर्भरता अब बड़े सवाल खड़े कर रही है। नगर निगम ने 1358 करोड़ रुपए की लागत से नर्मदा के चौथे चरण के तहत 450 एमएलडी पानी शहर तक लाने की नई योजना शुरू की है, जिसके बाद कुल आपूर्ति 900 एमएलडी तक पहुंच जाएगी। लेकिन इस परियोजना के साथ ही एक बहस तेज हो गई है, क्या इंदौर अपनी जरूरतों के लिए नर्मदा और उसके पारिस्थितिकी तंत्र पर अतिरिक्त दबाव डाल रहा है? 
    पर्यावरणविद चेतावनी दे रहे हैं कि यह केवल एक अस्थायी समाधान है, जो नदी के जलीय जीवों, वन्य प्राणियों और स्थानीय रहवासियों के हिस्से का पानी छीन सकता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इंदौर अपने पारंपरिक और स्थानीय जल स्रोतों को पुनर्जीवित करने के बजाय एक दूरस्थ नदी पर निर्भर होकर भविष्य के जल संकट को और गहरा कर रहा है?

    शहर की प्यास: मांग बनाम आपूर्ति

    : इंदौर की वर्तमान आबादी: लगभग 35–40 लाख
    : रोजाना पानी की अनुमानित जरूरत: 700–750 एमएलडी
    : वर्तमान सप्लाई: 550–600 एमएलडी (मुख्यतः नर्मदा से)
    : भूजल स्तर: लगातार गिरावट की स्थिति
    : स्थानीय जल स्रोत: कई तालाब और कुएं अतिक्रमण या उपेक्षा के शिकार
    (विशेषज्ञों के अनुसार, आने वाले वर्षों में आबादी बढ़ने के साथ पानी की मांग 900 एमएलडी से भी अधिक हो सकती है।)

    यह भी पढ़ें: इंदौर: वंदे मातरम विवाद के बाद पार्षद परेशान, कॉल्स से तंग आकर रूबीना खान ने बंद किया फोन

    नदी का संतुलन बिगड़ रहा है -

    भूजल विशेषज्ञ और पर्यावरणविद सुधीन्द्र मोहन शर्मा के अनुसार, इंदौर गंगा बेसिन में स्थित है, जबकि नर्मदा का बेसिन अलग है। ऐसे में एक बेसिन का पानी दूसरे में ले जाना पारिस्थितिकी संतुलन को प्रभावित करता है। उनका कहना है कि नर्मदा से 80 किलोमीटर दूर पानी लाना वहां के जलीय जीवों, वन्य प्राणियों और स्थानीय समुदायों के हिस्से के पानी पर दबाव डालता है। यह केवल तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के असंतुलन का मामला है। 

    ग्राउंड रिपोर्ट: शहर के अलग-अलग हिस्सों की हकीकत -
    बाणगंगा क्षेत्र:
    यहां रहने वाले रहवासी बताते हैं कि कई इलाकों में आज भी 2–3 दिन में एक बार पानी सप्लाई होता है। गर्मियों में स्थिति और खराब हो जाती है।

    सुदामा नगर:
    स्थानीय लोगों का कहना है कि नर्मदा का पानी आने के बावजूद दबाव (pressure) कम रहता है, जिससे ऊंचाई वाले इलाकों में पानी नहीं पहुंच पाता।

    सुपर कॉरिडोर क्षेत्र:
    नई कॉलोनियों में टैंकर पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है, जो यह दर्शाता है कि सप्लाई नेटवर्क पूरी तरह संतुलित नहीं है।

    नर्मदा ग्लेशियर नहीं, वर्षा आधारित नदी -
    एडवोकेट प्रदीप होलकर के अनुसार, नर्मदा मुख्य रूप से वर्षा आधारित नदी है। बीते कुछ वर्षों में बारिश के पैटर्न में बदलाव देखा गया है, जिससे भविष्य में जल उपलब्धता को लेकर अनिश्चितता बढ़ी है। नदी में कोई ग्लेशियर नहीं है, इसलिए यह मान लेना कि पानी हमेशा मिलता रहेगा, सही नहीं है।

    क्या इंदौर ने अपनी जड़ें छोड़ीं?

    पर्यावरणविद एस.एल. गर्ग बताते हैं कि होलकर काल में इंदौर में जल प्रबंधन की एक आत्मनिर्भर प्रणाली थी। हर मोहल्ले में 10–15 कुएं, 8–10 बड़े तालाब, वर्षा जल का स्थानीय स्तर पर संग्रह“आज वही शहर पूरी तरह बाहरी स्रोत पर निर्भर हो गया है, जो दीर्घकाल में जोखिम भरा है,” वे कहते हैं।

    समाधान क्या?

    : रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाना
    : पुराने तालाबों और कुओं का पुनर्जीवन
    : वॉटर रीसाइक्लिंग और रीयूज
    : भूजल रिचार्ज के लिए विशेष अभियान
    : पाइपलाइन लीकेज और वेस्टेज पर नियंत्रण
    (नोट: विशेषज्ञों के अनुसार, केवल नर्मदा पर निर्भरता के बजाय इंदौर को मल्टी-सोर्स मॉडल अपनाना होगा)

    होलकरों ने इंदौर बनाया था आत्मनिर्भर 
    पर्यावरण विद् एसएल गर्ग ने बताया कि इंदौर के राजा महाराजा और होलकर राजवंश द्वारा पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर सिस्टम तैयार किया था इंदौर शहर की नर्मदा पर निर्भरता ठीक नहीं है नर्मदा के पास भी एक सीमित दायरा है जिसके तहत नदी से पानी लिया जा सकता है। यदि नर्मदा नदी में पानी कम होता है तो फिर इतनी बड़ी करोड़ों रुपए की योजना का कोई औचित्य नहीं होगा। 
    नदियों से निकाला पानी जंगलों में पानी नहीं  -
    वही दिल्ली में पर्यावरण के लिए काम करने वाले पर्यावरण विद् गुणवंत राय ने बताया कि जिन नदियों से पानी लिया जा रहा है उनकी स्थिति का अध्ययन वर्तमान में किया जाना आवश्यक है। इस पर वर्तमान में समीक्षा अध्ययन और विश्लेषण किए जा रहे हैं। जंगलों में वन प्राणियों के लिए भी पानी की कमी देखी जा रही है। इंदौर के विषय में भी सभी पहलुओं पर अच्छे से विचार किया जाना चाहिए।


    वर्जन
    इंदौर में पानी को सहेजने का काम होलकरों ने किया था, लेकिन हमने उनकी विरासत को सहेजा नहीं। नर्मदा पर बढ़ती निर्भरता की भी एक सीमा है।
    एस.एल. गर्ग, पर्यावरणविद

    वर्जन -
    हमने मुख्यमंत्री से मांग की है कि हर विधानसभा में एक बड़ा तालाब बनाया जाए और पुराने कुएं-बावड़ी को पुनर्जीवित किया जाए।
    -    प्रदीप होलकर, एडवोकेट

    वर्जन 
    प्रकृति से हो रहा खिलवाड़ गिरते भूजल स्तर में दिख रहा है। कई जगह 700 फीट तक पानी नहीं बचा है, इंदौर को स्थायी समाधान खोजना होगा।
    सुधीन्द्र मोहन शर्मा, भूजल विशेषज्ञ

    वर्जन 
    अलग-अलग योजनाओं में पानी निकालने के बाद नदियों के प्राकृतिक स्वरूप पर असर पड़ रहा है। मध्यप्रदेश में नर्मदा का पानी औसतन 100 किलोमीटर दूर तक ले जाया जा रहा है।
    गुणवंत राय, पर्यावरणविद, नई दिल्ली

    Aakash Waghmare
    By Aakash Waghmare

    आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...Read More

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