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Teaching In Tribal Area :बच्चों की पढ़ाई के लिए घने जंगल में आदिवासी परिवारों के बीच ही रहने लगे शिक्षक राकेश धुर्वे

बालाघाट के कोदापार प्राइमरी स्कूल में बच्चों को शिक्षक दे रहे नई दिशा  
बच्चों की पढ़ाई के लिए घने जंगल में आदिवासी परिवारों के बीच ही रहने लगे शिक्षक राकेश धुर्वे
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    जितेंद्र चंद्रवंशी, जबलपुर। जब किसी शासकीय कर्मचारी की पदस्थापना नक्सल प्रभावित या आदिवासी क्षेत्र में होती है, तो अधिकांश लोग असुविधाओं और जोखिम के कारण वहां से स्थानांतरण के प्रयास करते हैं। लेकिन बालाघाट के बिरसा विकासखंड के ग्राम कोदापार में पदस्थ शिक्षक राकेश धुर्वे ने इस सोच को अपने कर्म से बदल दिया है। घने जंगलों से घिरे बैगा जनजाति बाहुल्य इस गांव में वर्ष 2010 से कार्यरत राकेश धुर्वे ने कठिन परिस्थितियों के बीच शिक्षा की अलख जगाई। लांजी तहसील के संदूका गांव निवासी राकेश धुर्वे को प्रारंभिक दिनों में प्रतिदिन 50 किलोमीटर की दूरी तय कर स्कूल पहुंचना पड़ता था। परिवहन, बिजली, संचार और अन्य सुविधाओं के अभाव के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी।

    शादी के बाद गांव में ही रहने का लिया निर्णय 

    शादी के बाद धुर्वे ने बच्चों के भविष्य संवारने के लिए इसी गांव में रहने का निर्णय लिया और कोदापार को अपना स्थाई ठिकाना बनाया। आज भी वे परिवार सहित यहीं रहकर बच्चों को शिक्षित कर रहे हैं। राकेश की बड़ी बेटी शशि धुर्वे ने इसी विद्यालय से पांचवीं कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया और वर्तमान में चारघाट माध्यमिक विद्यालय में कक्षा 6वीं में अध्ययनरत है। वहीं छोटी बेटी और बेटा अब भी कोदोपार प्राथमिक शाला में पिता से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इस प्रकार राकेश धुर्वे ने साबित किया कि सच्चे प्रयासों से शिक्षा का उजाला दुर्गम स्थानों में भी फैलाया जा सकता है।

    मॉडल स्कूल की पहचान

    वर्ष 2010 से ही उनके साथ शिक्षक घनश्याम शरणागत भी संस्था में सेवा दे रहे हैं। दोनों शिक्षकों ने मिलकर विद्यालय में अनुशासन, शिक्षा स्तर, स्वच्छता और सह-पाठ्य गतिविधियों को मजबूत किया। परिणामस्वरूप, आज कोदापार की शाला पूरे क्षेत्र में एक आदर्श विद्यालय के रूप में पहचानी जाती है। शिक्षक राकेश धुर्वे कहते हैं कि शुरुआत में परिस्थितियां कठिन थीं। संसाधन कम हैं, लेकिन बच्चों की सीखने की ललक ही हमारी शक्ति है। हमारा लक्ष्य है कि यहां के बच्चे भी मुख्यधारा से जुड़कर आगे बढ़ें। 

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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