नई दिल्ली। देश में मतदान को अनिवार्य बनाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए सुनवाई से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि, लोकतंत्र में वोट देना नागरिक का अधिकार है, लेकिन इसे बाध्यकारी नहीं बनाया जा सकता। यह मामला नीतिगत है और इसमें हस्तक्षेप करना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि, वोटिंग को अनिवार्य बनाना और वोट न देने वालों पर सजा या पाबंदी लगाना पूरी तरह से नीतिगत निर्णय है। ऐसे मामलों में फैसला सरकार और विधायिका को लेना होता है, न कि अदालत को। बेंच ने साफ कहा कि, अगर कोई नागरिक वोट नहीं डालता, तो उसे मजबूर नहीं किया जा सकता। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ होगा।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली शामिल थे। सुनवाई के दौरान बेंच ने कई अहम टिप्पणियां कीं। CJI ने कहा कि, क्या हम उन लोगों की गिरफ्तारी का आदेश दें जो वोट नहीं डालते? यह व्यावहारिक और संवैधानिक रूप से सही नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को अपने विवेक से फैसला लेने की स्वतंत्रता है।
कोर्ट ने कहा कि, लोकतंत्र कानूनी दबाव से नहीं, बल्कि जन जागरूकता से मजबूत होता है। लोगों को मतदान के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए, लेकिन उन्हें मजबूर करना सही तरीका नहीं है। CJI ने कहा कि, पिछले 75 वर्षों में भारत ने लोकतंत्र पर भरोसा दिखाया है। ऐसे में नागरिकों से उम्मीद की जाती है कि वे वोट डालें, लेकिन अगर कोई नहीं जाता, तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता।
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याचिकाकर्ता अजय गोयल ने कोर्ट में दायर याचिका में मांग की थी कि, देश में वोटिंग को अनिवार्य किया जाए। जो लोग जानबूझकर वोट नहीं डालते, उनके खिलाफ कार्रवाई हो। ऐसे लोगों को सरकारी सुविधाओं से वंचित किया जाए। चुनाव आयोग को इस संबंध में एक समिति बनाने का निर्देश दिया जाए। हालांकि, कोर्ट ने इन सभी मांगों को नीतिगत बताते हुए खारिज कर दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने अनिवार्य वोटिंग से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं का भी जिक्र किया। CJI ने उदाहरण देते हुए कहा कि, चुनाव के दिन कई लोग, जैसे जज और अन्य कर्मचारी, अपने काम में व्यस्त रहते हैं। अगर उन्हें मजबूर किया जाए, तो कामकाज प्रभावित होगा। उन्होंने हल्के अंदाज में कहा कि, अगर ऐसा नियम लागू हो जाए, तो जस्टिस बागची को भी कोर्ट का काम छोड़कर वोट डालने के लिए अपने राज्य जाना पड़ेगा।
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कोर्ट ने समाज के कमजोर और मजदूर वर्ग को लेकर भी चिंता जताई। बेंच ने कहा कि, अगर कोई गरीब व्यक्ति रोजी-रोटी कमाने के लिए काम पर जाता है, तो क्या उसे वोट न देने के लिए सजा दी जा सकती है? ऐसे लोगों के लिए अनिवार्य वोटिंग एक अतिरिक्त बोझ बन सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि, वे अपनी मांगों को लेकर सरकार या संबंधित प्राधिकरण के पास जाएं। क्योंकि यह मामला नीति से जुड़ा है और इस पर फैसला लेने का अधिकार सरकार के पास है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई मायनों में महत्वपूर्ण है-