मढ़ई क्षेत्र में पाए जाने वाले एल्बिनो गौर अपनी दुर्लभता, शारीरिक विशेषताओं और संरक्षण की जरूरतों के कारण चर्चा में हैं। यह न सिर्फ सतपुड़ा की जैव विविधता का प्रतीक है, बल्कि पूरे एशिया में अपनी तरह का अनोखा उदाहरण भी है। सतपुड़ा के जंगलों में चहलकदमी करता यह सफेद गौर न केवल प्रकृति का अनूठा चमत्कार है, बल्कि यह इस क्षेत्र की जैव विविधता और संरक्षण प्रयासों का जीवंत प्रतीक भी है। पर्यटकों के लिए यह एक अद्भुत अनुभव है, वहीं वन्यजीव विशेषज्ञों के लिए अध्ययन का महत्वपूर्ण विषय है।
एल्बिनो गौर का जन्म जेनेटिक म्यूटेशन के कारण होता है, जो प्रकृति में बहुत ही दुर्लभ घटना है। इन्हें अक्सर 'सफेद बाइसन' के रूप में जाना जाता है, जो इन्हें अन्य जानवरों से अलग बनाता है। समूचे भारत ही नहीं बल्कि एशिया में भी इनकी मौजूदगी बेहद सीमित है। सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में इनकी बहुतायत इसे और खास बनाती है।
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ये सामान्य गौर की तरह 2 मीटर से अधिक ऊंचे और 650 से एक हजार किलोग्राम से अधिक वजन के हो सकते हैं। इनका शरीर मांसल होता है और नर के कंधों पर एक प्रमुख कूबड़ होता है। सामान्य गौर गहरे रंग के होते हैं, जबकि एल्बिनो गौर का रंग पीला या सफेद होता है। इनकी आंखें आमतौर पर नीली या गुलाबी होती हैं, जो इन्हें और अलग बनाती हैं।

सफेद रंग होने के कारण ये जंगल में छिप नहीं पाते, जिससे शिकारियों का खतरा बढ़ जाता है। एल्बिनिज्म के कारण इनकी आंखों की नजर कमजोर होती है और त्वचा संबंधी समस्याएं भी होती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इनकी मृत्यु दर सामान्य गौर से अधिक होती है। वन विभाग इनकी निगरानी विशेष रूप से करता है ताकि इनकी संख्या बनी रहे।