शरद पूर्णिमा पर संत सिंगाजी धाम में उमड़ा आस्था का सैलाब, 2.5 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान
हरसूद। मध्य प्रदेश के निमाड़ क्षेत्र में शरद पूर्णिमा के अवसर पर संत सिंगाजी धाम में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। हरसूद से करीब 35 किलोमीटर दूर इंदिरा सागर बांध के बैकवाटर में स्थित टापू पर बने धाम में दूर-दराज के इलाकों से भक्त निशान लेकर पहुंच रहे हैं। मुख्य पर्व पर यहां 2 से 2.5 लाख श्रद्धालुओं के पहुंचने का अनुमान है। धाम में विशेष पूजा-अर्चना, धार्मिक अनुष्ठान और महाआरती की तैयारियां की गई हैं।
निशान लेकर धाम पहुंच रहे श्रद्धालु
संत सिंगाजी महाराज के प्रति निमाड़ और आसपास के क्षेत्रों में गहरी आस्था है। शरद पूर्णिमा पर मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों के साथ पड़ोसी राज्यों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। झाबुआ राजघराने सहित अलग-अलग स्थानों से निशान यात्राओं के आने का सिलसिला जारी है। निशान को संत के प्रति श्रद्धा, समर्पण और परंपरा का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालु निशान अर्पित करने के बाद समाधि स्थल पर मत्था टेककर आशीर्वाद लेते हैं। मुख्य पर्व को देखते हुए धाम परिसर को आकर्षक रोशनी से सजाया गया है। पूरे क्षेत्र में धार्मिक गतिविधियां जारी हैं।
शरद पूर्णिमा पर विशेष पूजा-अर्चना और महाआरती
शरद पूर्णिमा के अवसर पर संत सिंगाजी धाम में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और चंद्रदेव की पूजा-अर्चना के साथ समाधि स्थल पर भी अनुष्ठान होते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की किरणों का विशेष महत्व माना जाता है। इसी आस्था के चलते बड़ी संख्या में श्रद्धालु धाम पहुंचकर दर्शन-पूजन करते हैं। मुख्य पर्व पर निशान चढ़ाने के साथ विशेष पूजा-अर्चना और महाआरती मेले के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रहते हैं।
458 साल पुरानी बताई जाती है समाधि
संत सिंगाजी महाराज की समाधि करीब 458 वर्ष पुरानी बताई जाती है। पहले समाधि स्थल सिंगाजी गांव के मैदान में स्थित था। इंदिरा सागर बांध के निर्माण के बाद पुराना स्थान डूब क्षेत्र में आ गया। इसके चलते समाधि स्थल को बांध के बैकवाटर में बने टापू पर स्थापित किया गया। इसके बाद से यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। हर साल शरद पूर्णिमा पर यहां पारंपरिक मेले का आयोजन होता है, जिसमें बड़ी संख्या में भक्त संत सिंगाजी महाराज के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
निमाड़ के कबीर कहलाते हैं संत सिंगाजी महाराज
संत सिंगाजी महाराज को निमाड़ का कबीर भी कहा जाता है। उन्हें नर्मदांचल की महान आध्यात्मिक विभूतियों में गिना जाता है। उनके जीवन, जन्मस्थल और समाधि से जुड़ी मान्यताएं आज भी क्षेत्र की लोकपरंपराओं में प्रचलित हैं। मान्यता के अनुसार, संत सिंगाजी महाराज का जन्म बड़वानी जिले के खजूरी गांव में हुआ था। हालांकि, उनके जन्म और समाधि स्थल को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं। खजूरी गांव की पहाड़ियों पर सफेद निशान मौजूद होने की बात भी कही जाती है। निमाड़ और मालवा के पशुपालक संत सिंगाजी महाराज के प्रति विशेष श्रद्धा रखते हैं। पशुपालक अपनी आस्था के अनुसार पशु, दूध और घी अर्पित करते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही ये परंपराएं उनकी आध्यात्मिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं।
घी और नारियल चढ़ाने की परंपरा
संत सिंगाजी धाम में लगने वाला मेला करीब दस दिनों तक चलता है, लेकिन शरद पूर्णिमा का दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन समाधि स्थल पर दर्शन के लिए सबसे अधिक श्रद्धालु पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, संत सिंगाजी महाराज की समाधि पर सच्चे मन से मन्नत मांगने और देशी घी व नारियल अर्पित करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इसी विश्वास के चलते भक्त बड़ी संख्या में घी और नारियल चढ़ाते हैं। घी अर्पित करने की परंपरा के कारण मेले के दौरान बड़ी मात्रा में देशी घी एकत्र होता है। संत सिंगाजी धाम में हर साल उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ और निशान यात्राएं निमाड़ की लोकआस्था और वर्षों पुरानी धार्मिक परंपराओं की झलक पेश करती हैं।






















