दमोह में नरवाई से बनेगी जैविक खाद, 150 लोगों को मिला रोजगार; पराली जलाने पर प्रतिबंध

दमोह। शहर के नजदीक सागर-जबलपुर बाईपास पर फसल अवशेषों का संग्रहण किया जा रहा है, जिसमें ट्रैक्टर-ट्रॉलियों, मजदूरों और कर्मचारियों सहित करीब 150 लोगों को रोजगार मिला है। किसानों से अपील की जा रही है कि वे नरवाई जलाने के बजाय उसे संग्रहित करें, जिसके लिए खेतों से निःशुल्क उठाने और निर्धारित स्थल तक पहुंचाने पर तौल के आधार पर भुगतान की व्यवस्था बताई गई है। चिह्नित स्थानों पर मशीनें लगाकर अवशेषों से जैविक खाद तैयार करने की योजना है। दूसरी ओर, कलेक्टर प्रताप नारायण यादव ने जिले में नरवाई और पराली जलाने पर प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए हैं। प्रशासन ने निगरानी दलों, सैटेलाइट मैपिंग और कृषि यंत्रों के अनिवार्य उपयोग के जरिए नरवाई जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने की तैयारी की है।
दमोह में फसल अवशेषों के संग्रहण की पहल शुरू
दमोह जिले में फसल कटाई के बाद बचने वाले डंठल, पराली और नरवाई को जलाकर नष्ट करने के बजाय उनके उपयोग की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने और कार्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के प्रयासों के बीच फसल अवशेषों के संग्रहण और प्रबंधन की व्यवस्था शुरू हुई है। शहर के नजदीक सागर-जबलपुर बाईपास पर अवशेष एकत्रित किए जा रहे हैं। इस काम में ट्रैक्टर-ट्रॉलियों, मजदूरों और अन्य कर्मचारियों सहित करीब 150 लोगों को रोजगार मिला है। कर्मचारी जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में पहुंचकर खेतों से अवशेष एकत्रित कर उन्हें निर्धारित स्थानों तक पहुंचा रहे हैं।
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किसानों को खेतों से अवशेष उठाने की सुविधा
इस पहल के तहत किसानों से अपील की जा रही है कि वे फसल कटाई के बाद बचने वाले डंठल, पराली और नरवाई को खेतों में न जलाएं, बल्कि एकत्रित करके रखें। उपलब्ध व्यवस्था के अनुसार, ट्रैक्टर-ट्रॉली के माध्यम से खेतों से फसल अवशेषों को निःशुल्क उठाने की सुविधा दी जा रही है। वहीं, जो किसान अपने साधनों से अवशेष निर्धारित संग्रहण स्थल तक पहुंचाएंगे, उन्हें तौल के आधार पर प्रति टन निर्धारित राशि देने की व्यवस्था बताई गई है। इससे किसानों को खेतों की सफाई में मदद मिलने और अतिरिक्त मेहनत कम होने की उम्मीद है। साथ ही, नरवाई जलाने से मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचाव हो सकेगा।
मशीनों से तैयार होगी जैविक खाद
चिह्नित स्थानों पर फसल अवशेषों के प्रसंस्करण के लिए मशीनें स्थापित करने की योजना है। प्रस्तावित व्यवस्था के अनुसार, एकत्रित अवशेषों को कन्वेयर प्रणाली के माध्यम से काटा जाएगा और आवश्यक जांच तथा परीक्षण के बाद उनकी पैकिंग की जाएगी। इन अवशेषों से जैविक खाद तैयार करने की योजना है, जिसे किसानों को वितरित किया जाएगा। नेट जीरो की पहल से जुड़े राजीव सिंह के अनुसार, परियोजना के प्रत्येक पहलू पर ध्यान दिया जा रहा है और किसानों से नरवाई नहीं जलाने की अपील की जा रही है। मशीनों की स्थापना के बाद शुरुआती चरण में नमूनों के आधार पर किसानों को निःशुल्क खाद वितरित करने की योजना है।
12 स्थानों पर काम शुरू, उत्तर प्रदेश में भी किया गया प्रयोग
राजीव सिंह ने बताया कि फसल अवशेषों का संग्रहण करने के लिए खेतों तक पहुंच बनाई जा रही है और जो किसान स्वयं अवशेष निर्धारित स्थल तक लाएंगे, उन्हें तौल के आधार पर राशि दी जाएगी। संग्रहण कार्य के दौरान परिवहन सुविधा और सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी जा रही है। उनके अनुसार, उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में किसानों को 50 टन खाद उपलब्ध कराई गई थी। वहां किसानों ने रासायनिक खाद का उपयोग नहीं किया और धान के उत्पादन में वृद्धि होने की बात सामने आई। वर्तमान में 12 स्थानों पर इस तरह का कार्य शुरू किया गया है और भविष्य में इसका विस्तार करने का लक्ष्य है। इस पहल से स्थानीय स्तर पर रोजगार और फसल अवशेषों के बेहतर उपयोग की संभावनाएं बढ़ रही हैं।
कलेक्टर ने नरवाई जलाने पर लगाया प्रतिबंध
दमोह जिले में फसल अवशेषों को जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए जिला प्रशासन ने भी सख्त कदम उठाए हैं। कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट प्रताप नारायण यादव ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस), 2023 की धारा 163 के तहत जिले की संपूर्ण राजस्व सीमाओं में नरवाई और पराली जलाने पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधात्मक आदेश जारी किए हैं। प्रशासन के अनुसार, नरवाई जलाने से मिट्टी की उर्वरता प्रभावित होती है और उसमें मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीव तथा जैविक कार्बन नष्ट होते हैं। इससे भूमि की संरचना पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और धुएं के कारण वायु प्रदूषण बढ़ता है। इसका असर पर्यावरण के साथ जनस्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
सैटेलाइट मैपिंग से निगरानी
प्रशासन के निर्देशों के अनुसार, फसल कटाई में इस्तेमाल होने वाले कंबाइन हार्वेस्टर के साथ स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (एसएमएस) या स्ट्रॉ रीपर में से किसी एक मशीन का उपयोग अनिवार्य किया गया है। जिन क्षेत्रों में किसानों को भूसा प्राप्त करना है, वहां स्ट्रॉ रीपर का उपयोग आवश्यक रहेगा। नरवाई जलाने की घटनाओं पर नजर रखने के लिए राज्य स्तर पर सैटेलाइट मैपिंग की जा रही है, जिससे आग लगने वाले स्थानों की डिजिटल तस्वीरें और अलर्ट मिल सकेंगे। निगरानी दलों में नायब तहसीलदार, कृषि विस्तार अधिकारी, संबंधित पुलिस थाना प्रभारी, पटवारी और कोटवार को शामिल किया गया है, जबकि अनुविभाग स्तर पर पर्यवेक्षण दल गठित किए गए हैं।
अधिकारियों को दी गई जिम्मेदारी
अपर कलेक्टर एवं अपर जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में गठित जिला स्तरीय मॉनिटरिंग दल में कृषि विभाग, जिला परिवहन विभाग और कृषि अभियांत्रिकी के अधिकारियों को जिम्मेदारी दी गई है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के निर्देशों और पर्यावरणीय प्रावधानों के तहत नरवाई जलाने पर निर्धारित श्रेणियों के अनुसार पर्यावरण क्षतिपूर्ति राशि लगाने का भी प्रावधान है। कृषि विशेषज्ञ मल्चिंग, भूसा निर्माण, हैप्पी सीडर या सुपर सीडर से सीधी बोनी और बेलिंग जैसी विधियों को उपयोगी विकल्प मानते हैं। इन तकनीकों से नरवाई का उपयोग खेतों में ही किया जा सकता है या उसे अन्य उपयोगों के लिए एकत्रित किया जा सकता है। दमोह में यह पहल कितनी सफल होती है, यह संग्रहण की नियमितता, मशीनों की स्थापना, खाद की गुणवत्ता और किसानों तक लाभ पहुंचने पर निर्भर करेगा। जिला प्रशासन ने किसानों से नरवाई में आग नहीं लगाने और आधुनिक कृषि यंत्रों तथा उपलब्ध संग्रहण सुविधाओं का उपयोग करने की अपील की है।




















