दमोह में शासकीय कॉलेज की जमीन के पास बना 29 फीट चौड़ा रास्ता, पुराने नक्शे से उठे कई सवाल
दमोह। पथरिया तहसील में दमोह मार्ग पर स्थित शासकीय कॉलेज की भूमि को लेकर अब सवाल उठने लगे हैं। कॉलेज परिसर से लगे हिस्से में एक कच्चे रास्ते के विकसित होने और परिसर की सीमा पर दीवार बनाए जाने के बाद भूमि की वास्तविक स्थिति चर्चा में आ गई है। स्थानीय स्तर पर सामने आई जानकारी के मुताबिक कॉलेज के पीछे रहने वाले लोगों के लिए करीब 29 फीट चौड़ा और लगभग 300 फीट लंबा रास्ता दिखाई दे रहा है। मामले का अहम पहलू यह है कि पुराने अभिलेखीय नक्शे में कॉलेज की भूमि और मरघट भूमि के बीच किसी सार्वजनिक रास्ते या अलग सार्वजनिक भूमि का उल्लेख नहीं होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि वर्तमान में दिखाई दे रहा रास्ता कब और किस प्रक्रिया के तहत अस्तित्व में आया।
खसरा नंबर 470/1 की जमीन कॉलेज के लिए हुई थी आवंटित
जानकारी के अनुसार पथरिया में शासकीय कॉलेज के लिए भूमि की तलाश कई वर्ष पहले शुरू हुई थी। इसके बाद अनुशंसा के आधार पर पथरिया से पूर्व दिशा में स्थित खसरा नंबर 470/1, रकबा 4.047 हेक्टेयर भूमि कॉलेज के लिए आवंटित की गई थी। बताया जाता है कि भूमि आवंटन के समय इस पर किसी तरह की आपत्ति सामने नहीं आई थी। कॉलेज के आसपास तालाब और मरघट की भूमि भी मौजूद थी। इसके बाद इसी भूमि पर कॉलेज भवन का निर्माण किया गया।
लंबे समय तक नहीं बनी कॉलेज की बाउंड्रीवॉल
कॉलेज भवन बनने के बाद भी काफी समय तक परिसर की बाउंड्रीवॉल नहीं बन सकी। इस दौरान कॉलेज के पीछे बने मकानों में रहने वाले ग्रामीण मुख्य सड़क से अपने घरों तक पहुंचने के लिए कॉलेज परिसर के अंदर से आवागमन करते रहे। स्थानीय जानकारी के अनुसार पूर्व में पदस्थ प्रभारी प्राचार्यों के कार्यकाल में भी कॉलेज की पूरी सीमा पर दीवार का निर्माण नहीं हो पाया। अब वर्तमान प्रभारी प्राचार्य के कार्यकाल में कॉलेज की भूमि के किनारे कच्चे रास्ते का स्वरूप बदलता दिखाई दे रहा है और यह रास्ता आगे बढ़कर अपेक्षाकृत चौड़े मार्ग के रूप में नजर आ रहा है। इसी के साथ कॉलेज परिसर की सीमा पर दीवार का निर्माण भी दिखाई दे रहा है। इससे यह सवाल खड़ा हो रहा है कि पहले से हो रहे आवागमन को अब बाकायदा सड़क का रूप दिया जा रहा है या कॉलेज की भूमि की वास्तविक सीमा में किसी तरह का बदलाव हुआ है।
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पुराने और मौजूदा नक्शे में अंतर की जरूरत
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कॉलेज की जमीन, मरघट भूमि और आसपास की जमीन से जुड़े पुराने राजस्व नक्शे बताए जा रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पुराने नक्शे में कॉलेज के लिए आवंटित भूमि और मरघट के बीच किसी सार्वजनिक रास्ते अथवा अलग सार्वजनिक भूमि का उल्लेख नहीं था। यदि पुराने अभिलेखों में ऐसी कोई भूमि या रास्ता दर्ज नहीं था, तो मौजूदा समय में दिखाई दे रहा करीब 29 फीट चौड़ा रास्ता किस भूमि पर बना है, यह सवाल जांच का विषय बन गया है।
सीमांकन से साफ हो सकती है वास्तविक स्थिति
अब मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए राजस्व रिकॉर्ड, पुराने नक्शे और मौके पर मौजूद भूमि का सीमांकन महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह भी स्पष्ट होना जरूरी है कि कॉलेज के लिए आवंटित भूमि की वास्तविक सीमा मौके पर कहां तक है और वर्तमान में बनाई गई बाउंड्रीवॉल उसी सीमा को दर्शाती है या नहीं। इसके अलावा यदि पुराने समय से ग्रामीणों के आवागमन के लिए कोई रास्ता इस्तेमाल होता रहा है, तो उसकी राजस्व रिकॉर्ड में क्या स्थिति है और क्या उसे सार्वजनिक रास्ते के तौर पर मान्यता प्राप्त है, यह भी दस्तावेजों से स्पष्ट हो सकता है।
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इन सवालों के जवाब रिकॉर्ड से मिलेंगे
मामले में पुराने और नए नक्शे, खसरा अभिलेख, कॉलेज के लिए भूमि आवंटन से संबंधित दस्तावेज और वर्तमान सीमांकन की जानकारी सामने आने के बाद स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है। खास तौर पर यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि कॉलेज की जमीन की मूल सीमा क्या थी, वर्तमान में बनी दीवार किस आधार पर खड़ी की गई है और कॉलेज परिसर के पीछे दिखाई दे रहा रास्ता किस भूमि से होकर गुजर रहा है। यदि पुराने नक्शे में कॉलेज और मरघट के बीच सार्वजनिक रास्ता दर्ज नहीं था, तो वर्तमान रास्ते के लिए भूमि किस आधार पर उपलब्ध हुई, इसका जवाब भी राजस्व अभिलेखों और विधिवत सीमांकन से ही सामने आ सकता है।






















