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डर या सच...प्रेग्नेंसी में पैरासिटामोल पर नई रिसर्च से दावों पर विराम, जानें बच्चों के लिए कितनी खतरनाक?

पैरासिटामोल को लेकर लंबे समय से कई तरह के दावे किए जाते रहे हैं। खासतौर पर प्रेग्नेंसी में इसके इस्तेमाल को लेकर महिलाओं में डर बना रहता है। लेकिन हालिया वैज्ञानिक रिसर्च और एक्सपर्ट्स की राय क्या कहती है? क्या गर्भावस्था में पैरासिटामोल लेना सच में खतरनाक है या यह सिर्फ अफवाह है, जानिए पूरी सच्चाई।
प्रेग्नेंसी में पैरासिटामोल पर नई रिसर्च से दावों पर विराम, जानें बच्चों के लिए कितनी खतरनाक?
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    हेल्थ डेस्क। प्रेग्नेंसी का समय महिलाओं के लिए सबसे संवेदनशील दौर होता है। इस दौरान ली जाने वाली हर दवा को लेकर चिंता स्वाभाविक है। पिछले कुछ सालों में सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा तेजी से फैला कि प्रेग्नेंसी में पैरासिटामोल लेने से बच्चों में ऑटिज्म, ADHD या बौद्धिक विकलांगता का खतरा बढ़ सकता है। यहां तक कि कुछ सार्वजनिक बयानों ने इस डर को और हवा दी।

    इन दावों ने लाखों गर्भवती महिलाओं को डर और उलझन में डाल दिया। लेकिन अब इस मुद्दे पर एक बड़ी और भरोसेमंद वैज्ञानिक स्टडी सामने आई है, जिसने इन आशंकाओं को काफी हद तक दूर कर दिया है।

    नई स्टडी में क्या आया सामने?

    मेडिकल जर्नल The Lancet में प्रकाशित एक नए रिव्यू में साफ कहा गया है कि, गर्भावस्था के दौरान पैरासिटामोल लेने से बच्चों में ऑटिज्म, ADHD या बौद्धिक विकलांगता का कोई क्लिनिकली महत्वपूर्ण खतरा नहीं बढ़ता। इस स्टडी में अब तक की गई रिसर्च का गहराई से विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं के मुताबिक, पहले जिन अध्ययनों में पैरासिटामोल और न्यूरोडेवलपमेंटल समस्याओं के बीच संबंध बताया गया था, उनमें कई वैज्ञानिक खामियां थीं।

    पहले की स्टडीज पर क्यों उठे सवाल?

    नई रिसर्च के अनुसार, पुराने अध्ययनों में कई तरह की खामियां पाई गईं। इनमें डेटा कन्फ्यूजन, गलत याददाश्त पर आधारित जानकारी, अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का असर और पूर्वाग्रह (Bias) जैसे फैक्टर्स शामिल थे। इन्हीं कारणों से उन अध्ययनों के नतीजों को पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।

    असली वजह पैरासिटामोल नहीं?

    रिसर्च बताती है कि, बच्चों में ऑटिज्म या न्यूरोडेवलपमेंटल समस्याओं की वजह पारिवारिक और जेनेटिक फैक्टर्स ज्यादा हो सकते हैं। एक ही परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी ऐसे लक्षण दिखना ज्यादा तर्कसंगत कारण माना गया है, बजाय इसके कि पैरासिटामोल को सीधे जिम्मेदार ठहराया जाए।

    तीन स्टेप में की गई जांच

    शोधकर्ताओं ने पैरासिटामोल और प्रेग्नेंसी से जुड़ी स्टडीज को तीन चरणों में परखा-

    पहला स्टेप: 4,147 स्टडीज की शुरुआती जांच, जिनमें से 4,092 को विषय से सीधे जुड़े न होने के कारण बाहर किया गया।

    दूसरा स्टेप: 55 फुल-टेक्स्ट रिसर्च पेपर्स की समीक्षा, जिनमें से 12 को डिजाइन या डेटा की कमी के कारण हटाया गया।

    तीसरा स्टेप: 43 स्टडीज का व्यवस्थित रिव्यू, जिसमें से 17 हाई-क्वालिटी रिसर्च को डिटेल एनालिसिस के लिए चुना गया।

    खास तौर पर भाई-बहनों की तुलना (Sibling Comparison Studies) वाले अध्ययनों को प्राथमिकता दी गई, ताकि जेनेटिक और पारिवारिक प्रभाव को अलग किया जा सके।

    एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

    स्टडी की सीनियर राइटर प्रोफेसर अस्मा खलील के मुताबिक, बिना ठोस वैज्ञानिक सबूत के ऐसे दावे गर्भवती महिलाओं में बेवजह डर पैदा करते हैं। उनके मुताबिक, मौजूदा वैज्ञानिक साक्ष्य इन आशंकाओं का समर्थन नहीं करते और मेडिकल गाइडलाइंस के तहत डॉक्टर की सलाह से लिया गया पैरासिटामोल प्रेग्नेंसी में सुरक्षित माना जाता है, खासकर दर्द और बुखार की स्थिति में।

    गर्भवती महिलाओं के लिए जरूरी संदेश

    यह रिसर्च यह नहीं कहती कि गर्भावस्था में बिना डॉक्टर की सलाह दवाइयों का इस्तेमाल किया जाए। लेकिन यह जरूर स्पष्ट करती है कि, पैरासिटामोल को लेकर फैला डर वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है। सही जानकारी लेना और डॉक्टर की सलाह का पालन करना सबसे जरूरी है, वहीं सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों पर आंख बंद कर भरोसा करने से बचना चाहिए।

    Manisha Dhanwani
    By Manisha Dhanwani

    मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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