इस्लामाबाद। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया विवाद उस वक्त खड़ा हो गया, जब पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने इजरायल के खिलाफ तीखी और विवादित टिप्पणी कर दी। यह मामला इतना बढ़ गया कि इजरायल की कड़ी प्रतिक्रिया के बाद उन्हें अपना सोशल मीडिया पोस्ट डिलीट करना पड़ा।
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब पाकिस्तान खुद को एक जिम्मेदार मध्यस्थ के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहा है और इस्लामाबाद में अहम शांति वार्ता की तैयारी चल रही है।
ख्वाजा आसिफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट करते हुए इजरायल को इंसानियत के लिए अभिशाप बताया। उन्होंने लेबनान में हो रही सैन्य कार्रवाई का जिक्र करते हुए आरोप लगाया कि, इजरायल लगातार निर्दोष नागरिकों पर हमले कर रहा है।
उन्होंने अपने पोस्ट में गाजा, ईरान और लेबनान का उल्लेख करते हुए कहा कि, इजरायल की कार्रवाई लगातार खून-खराबा बढ़ा रही है। उनके इस बयान में इस्तेमाल की गई भाषा बेहद कठोर थी, जिसे कई देशों ने कूटनीतिक मर्यादाओं के खिलाफ माना। यह पोस्ट सामने आते ही तेजी से वायरल हो गया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।

ख्वाजा आसिफ के बयान पर इजरायल ने तुरंत प्रतिक्रिया दी। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के कार्यालय ने इस बयान को अपमानजनक और अस्वीकार्य करार दिया। नेतन्याहू के कार्यालय ने कहा कि, इस तरह की भाषा किसी भी सरकार के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकती, खासकर उस देश के लिए जो खुद को शांति वार्ता में एक तटस्थ मध्यस्थ बताता है।
इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार ने भी इस बयान की कड़ी आलोचना की। उन्होंने इसे यहूदी-विरोधी और झूठे आरोपों से भरा बताया और कहा कि इस तरह के बयान इजरायल के खिलाफ उकसावे की श्रेणी में आते हैं।
इजरायल की इस तीखी प्रतिक्रिया के बाद पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने लगा। कूटनीतिक हलकों में यह सवाल उठने लगे कि क्या पाकिस्तान वास्तव में निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है। जब कोई देश शांति वार्ता की मेजबानी कर रहा होता है, तो उससे संतुलित और संयमित भाषा की अपेक्षा की जाती है। ऐसे में ख्वाजा आसिफ का बयान पाकिस्तान की उस छवि के विपरीत था, जिसे वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर स्थापित करना चाहता है। बढ़ते दबाव और आलोचना के बीच आखिरकार ख्वाजा आसिफ को अपना पोस्ट हटाना पड़ा। इसे एक तरह का डैमेज कंट्रोल कदम माना जा रहा है।
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है, जब पाकिस्तान इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता की मेजबानी करने जा रहा है। इस संवेदनशील स्थिति में इस तरह का बयान पाकिस्तान की भूमिका को कमजोर कर सकता था। अगर पाकिस्तान किसी एक पक्ष के खिलाफ खुले तौर पर टिप्पणी करता है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
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इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि लेबनान में इजरायल की सैन्य कार्रवाई से जुड़ी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इजरायल ने हिज्बुल्लाह के ठिकानों पर बड़े पैमाने पर हमले किए, जिसमें भारी संख्या में लोग मारे गए और घायल हुए। इस कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई, लेकिन इजरायल का कहना है कि उसने यह कार्रवाई अपनी सुरक्षा के तहत की है और लेबनान के साथ कोई औपचारिक युद्धविराम लागू नहीं है। इसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए ख्वाजा आसिफ ने अपना बयान दिया था, जो बाद में विवाद का कारण बन गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने पाकिस्तान के सामने एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ पाकिस्तान खुद को क्षेत्रीय शांति प्रक्रिया में एक अहम खिलाड़ी के रूप में पेश करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ इस तरह के बयान उसकी विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।