पश्चिम बंगाल :SIR क्लेम वेरिफिकेशन निपटारे के लिए ओडिशा- झारखंड के जज करेंगे मदद, EC उठाएगा खर्च

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चर रही विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की लेटलतीफी प्रोसेस में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा बताई गई एसआईआर प्रोसेस को जल्द सुलझाने के लिए झारखंड और ओडिशा के सिविज जज मदद करेंगे। इस प्रोसेस का पूरा खर्च इलेक्शन कमीशन उठाएगा।
80 लाख क्लेम अटके
बंगाल से जुड़े SIR मामले की सुनवाई CJI सूर्यकांत, जस्टिस जयमॉल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच कर रही थी। दरअसल पश्चिम बंगाल में इस समय 80 लाख क्लेम अटके हुए हैं। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभारता से हर पहलू को बारिकी से समझकर इस फैसले पर पहुंचा है। बेंच ने आज की सुनवाई में चुनाव आयोग से कहा कि वह 28 फरवरी तक SIR की लिस्ट पब्लिश कर सकता है।
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20 फरवरी को SC ने जजों की मदद लेने का निर्देश दिया था
वहीं इसके साथ-साथ बेंच का यह भी कहना है कि अगर वोटर वेरिफिकेशन प्रोसेस आगे बढ़ता है तो पोल पैनल सप्लिमेंट्री लिस्ट पब्लिश कर सकता है जहां इससे पहले 20 फरवरी को पश्चिम बंगाल सरकार और इलेक्शन कमीशन के बीच जारी सियासी बयानबाजी से काफी नाराज हुआ था। जिसके बाद कोर्ट ने रास्ता निकाला था वोटर वेरिफिकेशन में पोल पैनल की मदद के लिए मौजूदा और पूर्व जिला जजों की मदद लेने का निर्देश दिया था।
कलकत्ता हाईकोर्ट- क्लेम से निपटने के लिए लगभग तीन महीने लग सकते
इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट को लेटर भी लिखा था। लेटर में कोर्ट ने चिंता जाहिर करते हुए लिखा कि राज्य में 80 लाख क्लेम पूरा करने के लिए 80 दिन का समय लग सकता है। इसमें कुल 250 डिस्ट्रिक्ट जजों की मदद लली जा सकती है। इस समस्या को सुनने के बाद चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने डिस्ट्रिक्ट जज की तैनाती करने की परमिशन दी थी।
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सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल कर आदेश किया जारी
सुप्रीम कोर्ट ने अपनी विशेष संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए आदेश दिया है कि पश्चिम बंगाल में सप्लीमेंट्री इलेक्टोरल रोल में दर्ज मतदाताओं को अंतिम मतदाता सूची का हिस्सा माना जाएगा। कोर्ट ने यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सुनाया।
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी मामले में “पूर्ण न्याय” सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश या डिक्री जारी कर सके। इस अनुच्छेद के तहत दिया गया आदेश देशभर में प्रभावी होता है।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि ये शक्तियां असीम नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट संविधान और मौलिक अधिकारों के विरुद्ध कोई आदेश नहीं दे सकता और न ही भारतीय संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का उल्लंघन कर सकता है।











