अशोक गौतम, भोपाल। प्रदेश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत करीब 5.40 करोड़ हितग्राहियों को अब अगले महीने से पोषण युक्त फोर्टिफाइड चावल नहीं मिलेगा। केंद्र सरकार ने फिलहाल इस योजना पर रोक लगा दी है। अब केवल पुराने स्टॉक का ही वितरण किया जाएगा।
सरकार फोर्टिफाइड चावल तैयार करने में हर साल करीब 200 करोड़ रुपए खर्च कर रही थी। इसके बावजूद लाभार्थियों द्वारा पोषक तत्वों को अलग कर फेंक देने के कारण यह पूरी राशि बेअसर साबित हो रही थी।
प्रदेश में इस योजना की शुरुआत वर्ष 2023 में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने की थी। यह केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना थी, जिसे शुरुआत में सिंगरौली, अनूपपुर और भिंड जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में लागू किया जाना था। हालांकि, सिंगरौली के अलावा अन्य जिलों में इसे प्रभावी रूप से लागू नहीं किया जा सका। बाद में केंद्र ने इसे सभी जिलों तक विस्तार दे दिया, लेकिन जमीनी स्तर पर अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।
योजना लागू होने के बाद आईआईटी खड़गपुर, भारतीय चिकित्सा एवं अनुसंधान परिषद और राष्ट्रीय पोषण संस्थान द्वारा अध्ययन कराया गया। रिपोर्ट में सामने आया कि लोग चावल पकाने से पहले धोते समय ऊपर तैरने वाले फोर्टिफाइड दानों को कचरा समझकर निकाल देते हैं या बहा देते हैं।
फोर्टिफाइड चावल सामान्य चावल के पाउडर में विटामिन और खनिज मिलाकर तैयार किया जाता है। इसमें विटामिन ए, बी कॉम्प्लेक्स, डी, आयरन और जिंक जैसे तत्व शामिल होते हैं। इसे छोटे कैप्सूल जैसे दानों के रूप में बनाया जाता है और 100 सामान्य चावल के दानों में एक दाना मिलाकर सप्लाई किया जाता है।
इस योजना में कुल लागत का 75 फीसदी हिस्सा केंद्र सरकार और 25 फीसदी हिस्सा राज्य सरकार वहन करती है। एक किलोग्राम चावल के फोर्टिफिकेशन पर करीब 73 पैसे का खर्च आता है।
योजना के असफल होने की सबसे बड़ी वजह जागरूकता की कमी मानी जा रही है। तीन साल में भी सरकार यह समझाने में सफल नहीं हो पाई कि चावल में मिलाए गए ये दाने पोषक तत्व हैं, जिन्हें फेंकना नहीं है। इसी कारण लाभार्थी अनजाने में पोषण को ही नुकसान पहुंचा रहे थे।