नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई अब बेहद अहम मोड़ पर पहुंच गई है। पांचवें दिन की बहस में धार्मिक आस्था, सामाजिक सुधार और संविधान की व्याख्या को लेकर गहरी चर्चा हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कोर्ट को बताया कि आस्था समय के साथ बदलती है और यह बदलाव समाज के भीतर से आता है, न कि केवल कानून बनाने से।
सुनवाई के दौरान धवन ने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा को स्थायी मान लेना सही नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि समाज जैसे-जैसे बदलता है, वैसे-वैसे उसकी मान्यताएं भी बदलती हैं। अगर कानून समाज से कटकर बनेगा, तो उसका असर सीमित रह जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक सुधार तभी सफल होता है, जब लोग उसे स्वीकार करें, वरना बहस मूल मुद्दे से भटक सकती है।
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इससे पहले 15 अप्रैल को 9 जजों की बेंच ने कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना बेहद कठिन है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। इससे साफ है कि अदालत इस मामले में संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने महिलाओं की एंट्री का कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि सबरीमाला एक विशेष परंपरा वाला मंदिर है, जहां भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है। इसलिए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं की एंट्री परंपरा के खिलाफ है।
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मंदिर की परंपरा अलग और विशिष्ट है
यह विवाद नया नहीं है, बल्कि कई दशकों पुराना है। 1991 में केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब सुनवाई हो रही है।
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एडवोकेट राजीव धवन ने भारत को मल्टी सिविलाइजेशन स्टेट बताते हुए कहा कि यहां की विविधता दुनिया में अनोखी है। ऐसे में कोर्ट का कोई भी फैसला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर अन्य धार्मिक और खासकर आदिवासी परंपराओं पर भी पड़ेगा।