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New Delhi :महिलाओं की एंट्री पर सबरीमाला विवाद, 5वें दिन की सुनवाई, कोर्ट में टकराए परंपरा और अधिकार

एडवोकेट राजीव धवन ने भारत को मल्टी सिविलाइजेशन स्टेट बताते हुए कहा कि यहां की विविधता दुनिया में अनोखी है। ऐसे में कोर्ट का कोई भी फैसला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा
महिलाओं की एंट्री पर सबरीमाला विवाद, 5वें दिन की सुनवाई, कोर्ट में टकराए परंपरा और अधिकार

नई दिल्ली। केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई अब बेहद अहम मोड़ पर पहुंच गई है। पांचवें दिन की बहस में धार्मिक आस्था, सामाजिक सुधार और संविधान की व्याख्या को लेकर गहरी चर्चा हुई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कोर्ट को बताया कि आस्था समय के साथ बदलती है और यह बदलाव समाज के भीतर से आता है, न कि केवल कानून बनाने से।

वकील- सामाजिक सुधार तभी सफल जब 'लोग इसे स्वीकारे'

सुनवाई के दौरान धवन ने कहा कि किसी भी धार्मिक परंपरा को स्थायी मान लेना सही नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि समाज जैसे-जैसे बदलता है, वैसे-वैसे उसकी मान्यताएं भी बदलती हैं। अगर कानून समाज से कटकर बनेगा, तो उसका असर सीमित रह जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक सुधार तभी सफल होता है, जब लोग उसे स्वीकार करें, वरना बहस मूल मुद्दे से भटक सकती है।

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सामाजिक सुधार के नाम पर धर्म को कमजोर करना गलत- SC

इससे पहले 15 अप्रैल को 9 जजों की बेंच ने कहा था कि करोड़ों लोगों की आस्था को गलत ठहराना बेहद कठिन है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामाजिक सुधार जरूरी है, लेकिन उसके नाम पर धर्म को कमजोर नहीं किया जा सकता। इससे साफ है कि अदालत इस मामले में संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।

क्यों हो रहा महिलाओं का विरोध?

त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) ने महिलाओं की एंट्री का कड़ा विरोध किया। उनका कहना है कि सबरीमाला एक विशेष परंपरा वाला मंदिर है, जहां भगवान अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है। इसलिए 10 से 50 वर्ष की महिलाओं की एंट्री परंपरा के खिलाफ है।

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TDB ने कहीं ये बड़ी बातें

मंदिर की परंपरा अलग और विशिष्ट है

  • अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है
  • देश में कई अन्य अयप्पा मंदिर मौजूद हैं
  • महिलाओं को वहां दर्शन का विकल्प उपलब्ध है

1991 में केरल HC ने महिलाओं की एंट्री पर रोक लगाई थी

यह विवाद नया नहीं है, बल्कि कई दशकों पुराना है। 1991 में केरल हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई थी, जिसे 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं, जिन पर अब सुनवाई हो रही है।

  • मामले में अब तक क्या- क्या हुआ?
  • 1991: हाईकोर्ट ने एंट्री बैन की
  • 2018: सुप्रीम कोर्ट ने बैन हटाया
  • 2026: पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई जारी

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एडवोकेट राजीव धवन ने भारत को मल्टी सिविलाइजेशन स्टेट बताते हुए कहा कि यहां की विविधता दुनिया में अनोखी है। ऐसे में कोर्ट का कोई भी फैसला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका असर अन्य धार्मिक और खासकर आदिवासी परंपराओं पर भी पड़ेगा।

यह मामला अब सिर्फ महिलाओं के प्रवेश का नहीं रहा, बल्कि यह तीन बड़े सवालों से जुड़ गया है-

  • क्या धार्मिक परंपराएं संविधान से ऊपर हैं?
  • क्या सामाजिक सुधार सभी जगह समान रूप से लागू होना चाहिए?
  • क्या आस्था में बदलाव कानून से लाया जा सकता है?
Aakash Waghmare
By Aakash Waghmare

आकाश वाघमारे | MCU, भोपाल से स्नातक और फिर मास्टर्स | मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर के तौर पर 3 वर्षों का क...

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