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Sabarimala Case : 'धर्म में अंधविश्वास' पर तीखी बहस, नौ जजों की बेंच में सुप्रीम सुनवाई, सामने आए अलग-अलग तर्क

सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर मामले से जुड़ी सुनवाई के दूसरे दिन बुधवार को किसी धर्म में कौन सी प्रथा अंधविश्वास है, तय करने का अधिकार और अधिकार क्षेत्र पर बहस हुई। केंद्र सरकार की ओर से कहा गया था एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकती क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं।
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'धर्म में अंधविश्वास' पर तीखी बहस, नौ जजों की बेंच में सुप्रीम सुनवाई, सामने आए अलग-अलग तर्क
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट धर्म और अंधविश्वास के दायरे पर एक अहम संवैधानिक सवाल पर विचार कर रहा है। केंद्र सरकार की उस दलील जिसमें सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि 'एक धर्मनिरपेक्ष अदालत इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर सकती, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, न कि धर्म के' बाद इस पर विचार किया जा रहा है।

    अदालत यह तय करने का अधिकार रखती है : जस्टिस अमानुल्लाह

    बुधवार को नौ जजों की संविधान पीठ के सामने सुनवाई के दौरान जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने स्पष्ट कहा कि अदालत यह तय करने का अधिकार रखती है कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा अंधविश्वास की श्रेणी में आती है। उन्होंने केंद्र के तर्क को बहुत सरल बताते हुए कहा कि अदालत के अधिकार क्षेत्र को इस तरह सीमित नहीं किया जा सकता। जस्टिस अमानुल्लाह के अनुसार, किसी प्रथा को अंधविश्वास मानने के बाद आगे क्या कार्रवाई होगी, यह अलग विषय हो सकता है, लेकिन अदालत यह नहीं कह सकती कि केवल विधायिका का फैसला ही अंतिम होगा।

    जादू-टोना धार्मिक प्रथा हो तो क्या अंधविश्वास नहीं? : जस्टिस बागची

    सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि यदि जादू-टोना को किसी धार्मिक परंपरा का हिस्सा बताया जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा। जस्टिस बागची ने यह भी जानना चाहा कि यदि संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत अदालत के पास ऐसी याचिका आती है और विधायिका इस विषय पर मौन रहती है, तो क्या अदालत ‘खाली क्षेत्र के सिद्धांत’ का उपयोग करते हुए स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के आधार पर उस प्रथा पर रोक लगाने का निर्देश नहीं दे सकती। यह सवाल धर्म और संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन को लेकर अदालत की गंभीरता को दर्शाता है।

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    धार्मिक प्रथा को उसी धर्म की फिलॉसफी से परखा जाना चाहिए : जस्टिस नागरत्ना

    जस्टिस बीवी नागरत्ना ने सुनवाई के दौरान अलग दृष्टिकोण रखते हुए कहा कि किसी आवश्यक धार्मिक प्रथा को तय करते समय अदालत को उस धर्म की मूल फिलॉसफी को आधार बनाना चाहिए। उन्होंने कहा, “आप किसी दूसरे धर्म के विचारों को लागू नहीं कर सकते और यह नहीं कह सकते कि यह आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है। अदालत का दृष्टिकोण उस धर्म की फिलॉसफी को लागू करना है, जो स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन हो।” उनका मत धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक सीमाओं के बीच संतुलन बनाने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

    अदालत धर्म की विशेषज्ञ नहीं, सुधार का अधिकार विधायिका को : केंद्र सरकार

    केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कौन-सी प्रथा अंधविश्वास है, क्योंकि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। उन्होंने कहा कि यदि किसी प्रथा में सुधार की जरूरत है, तो संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत विधायिका कानून बनाकर बदलाव कर सकती है। मेहता ने उदाहरण देते हुए कहा कि जादू-टोना जैसी प्रथाओं को रोकने के लिए पहले भी कानून बनाए गए हैं। अब इस संवैधानिक बहस पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।  

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    तुषार मेहता और राजीव धवन के बीच विवाद 

    सुनवाई शुरू होते ही एडवोकेट राजीव धवन ने कोर्ट के सामने वक्त का विषय उठाया।  उन्होंने कहा कि अगर याचिकाकर्ताओं के लिए तय 3 दिनों की समयसीमा पर गिलोटिन गिरनी है तो बाकी वकीलों को घर चले जाना चाहिए। इस दौरान धवन और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच छोटा विवाद भी हुआ, जिसमें धवन ने मेहता से कहा, 'चुप रहिए और बीच में मत टोकिए।' इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि अप्रैल में सुनवाई इसलिए रखी गई है, ताकि गर्मियों की छुट्टियों के दौरान बेंच के पास सभी डॉक्यूमेंट्स को पढ़ने का समय रहे। 

    Naresh Bhagoria
    By Naresh Bhagoria

    नरेश भगोरिया। 27 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हूं। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववि...Read More

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