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मोबाइल-लैपटॉप के साइड इफेक्ट :बच्चों का निकल रहा कूबड़, पांच साल में दोगुना बढ़ी परेशानी

फिजियोथैरेपिस्ट और स्पाइन सेंटरों में पहुंच रहे 14 साल से कम उम्र के हाइपर काइफोसिस से पीड़ित बच्चे, डॉक्टरों ने जताई चिंता। विधायक ने अपनी ही सरकार को चेताया, बढ़ते मामलों का हवाला देकर इनके ज्यादा उपयोग पर रोक लगाने की मांग की।
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बच्चों का निकल रहा कूबड़, पांच साल में दोगुना बढ़ी परेशानी
AI जनरेटेड सारांश
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    भोपाल। अगर आपके बच्चे घंटों झुकी गर्दन के साथ मोबाइल या लैपटॉप में डूबे रहते हैं, तो सावधान हो जाएं। यह आदत धीरे-धीरे रीढ़ की हड्डी को टेढ़ा कर रही है। पांच साल पहले तक इक्का दुक्का मामले सामने आते थे, लेकिन अब यह बीमारी बढ़ती जा रही है। पहले यह समस्या बुजुर्गों में ऑस्टियोपोरोसिस के कारण दिखती थी, लेकिन अब 14 साल के नीचे के बच्चों में भी दिख रही है।

    इसमें रीढ़ ही हड्डी का ऊपरी भाग झुक जाता है, जिसे हाइपरकाइफोसिस या कुबड़ापन कहते हैं। समस्या इतनी बढ़ रही है कि विधानसभा सत्र के दौरान इनके ज्यादा उपयोग पर रोक लगाने और सरकार से नियम बनाने की मांग की गई। जबलपुर के भाजपा विधायक डॉ. पीयुष पांडे ने सरकार को चेताया कि, अगर इस पर अभी नियम नहीं बनाया तो 10 साल में यह बीमारी महामारी का रूप ले लेगी।

    किशोरों व युवाओं में भी बढ़ रही समस्या

    फिजियोथैरेपिस्ट (स्पाइन एक्सपर्ट) डॉ. सुनील पांडे का कहना है कि, लंबे समय तक गर्दन झुकाकर स्क्रीन देखने से रीढ़ की ऊपरी हड्डियों पर लगातार दबाव पड़ता है। पहले जहां ऐसी समस्याएं बुजुर्गों में आम थीं, वहीं अब युवा के साथ किशोर भी इसकी चपेट में आने लगे हैं। पहले इक्का दुक्का माला ही मिलता था, लेकिन अब हर महीने आठ से दस मामले ऐसे आते हैं। इसमें से एक या दो मामले सीवियर होते हैं।

    विधायक बोले- सरकार बनाए नियम

    भाजपा विधायक डॉ. पीयुष पांडे बोले- 14 साल के कम उम्र के बच्चे मोबाइल और इंटरनेट की लत के कारण ब्रेन इफेक्ट हो रहा है। इसका असर आंखों पर भी होता है। 10 से 12 साल के बच्चों को चश्मा लग रहा है। रीढ़ की हड्डी प्रभावित हो रही है। मैंने सरकार से आग्रह किया है कि, इस पर सरकार को कठोर नियम बनाते हुए मोबाइल के ज्यादा उपयोग पर बैन लगाना चाहिए।

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    इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

    डॉ. पांडे ने बताया कि, अगर आज की पीई पीढ़ी ने पॉश्चर पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाले समय में समाज में सीधी रीढ़ वाला व्यक्ति दुर्लभ हो जाएगा।

    • पीठ झुकना गर्दन और कंधों में लगातार दर्द।
    • थोड़ी देर में ही थकान।
    • भारी बैग उठाने में परेशानी।
    • सांस फूलना या फेफड़ों की क्षमता कम होना।
    • चलने के तरीके में बदलाव और बैलेंस बिगड़ना।

    पॉश्चर पर ध्यान नहीं दिया तो बढ़ेगी समस्या

    फिजियोथैरेपिस्ट डॉ. तपस्या तोमर ने बताया कि, फिजियोथैरेपी समय रहते शुरू की जाए तो सुधार संभव है। पॉश्चर करेक्शन एक्सरसाइज को और बैंक स्ट्रेंथनिंग इलेक्ट्रोथैरेपी (लेजर, टेकार, एठर, डीकम्प्रेशन आदि) बच्चों और किशोरों में गंभीर मामलों में स्पाइनल फ्यूजन सर्जरी की जाती है। ऑनलाइन क्लास, गेमिंग, ओटीटी और सोशल मीडिया के लगातार उपयोग ने बच्चों और युवाओं की रीढ़ पर सीधा असर डाला है। लंबे समय तक गर्दन झुकाकर स्क्रीन देखना रीढ़ को आगे की ओर धकेल देता है। खराब पॉश्चर से मांसपेशियां कमजोर होती हैं और रीढ़ का प्राकृतिक आकार बिगड़ जाता है।

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    इन बातों का रखें ध्यान

    • मोबाइल की स्क्रीन लैपटॉप की तरह आंख के सामने लाकर देखें।
    • गर्दन नीचे न करें, इससे आंख और गर्दन दोनों पर बुरा असर आएगा।
    • स्क्रीन पर लगातार 20 मिनट तक आंखें न गड़ाए रहें, पलकें झपकाते रहें।
    • स्क्रीन देखने के बाद आंखें फैलाकर देखें, गर्दन इधर-उधर घुमा लें।
    • गर्दन को दुरुस्त रखने वाली यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करें।

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    Manisha Dhanwani
    By Manisha Dhanwani

    मनीषा धनवानी | जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी से BJMC | 6 वर्षों के पत्रकारिता अनुभव में सब-एडिटर, एंकर, ...Read More

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