Download App
Download on the App StoreGet it on Google Play
Breaking News

महाकाल दरबार में 5500 पुलिसकर्मियों की अर्जी,अफसरों की बंगला चाकरी के बजाय थानों में पोस्टिंग की गुहार

ट्रेड आरक्षको को विभागीय परीक्षा पास करके थानों में पोस्टिंग के प्रावधान को 2012 से रोक दिया गया है, जिससे बंगला ड्यूटी करते हुए ही रिटायर हो रहे हैं।
अफसरों की बंगला चाकरी के बजाय थानों में पोस्टिंग की गुहार
    यह सारांश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस द्वारा तैयार किया गया है और हमारी टीम द्वारा रिव्यू की गई है।

    उज्जैन/ भोपाल।  मध्यप्रदेश पुलिस के 5500 से अधिक ट्रेड आरक्षकों ने देश में शायद पहली बार एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए अपनी पीड़ा सीधे न्याय के देवता महाकाल बाबा के दरबार में रखी है। इन सिपाहियों ने उज्जैन में बाबा के चरणों में अर्जी लगाने के बाद एक  सामूहिक प्रार्थना-पत्र मुख्यमंत्री को भेजकर हस्तक्षेप की गुहार लगाई है।  टेÑड आरक्षक चाहते हैं कि 5 साल की सेवा अवधि के बाद पूर्व की तरह विभागीय परीक्षा पास करने पर थानों में पोस्टिंग दी जाए। 

    महाकाल बाबा को अर्पित अर्जी के माध्यम से ट्रेड आरक्षकों कहना है कि उन्हें जनता की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के निजी बंगलों में घरेलू नौकरों की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें झाड़ू-पोंछा, बर्तन धोना, साफ-सफाई करना, खाना बनाना, जूता पालिश, कारपेंटर सहित बच्चों और पालतू कुत्तों की देखभाल जैसे कार्य उनसे कराए जा रहे हैं। यह न केवल संविधान बल्कि मानवाधिकारों का भी खुला उल्लंघन है।

    तत्कालीन पुलिस महानिदेशक नंदन दुबे ने 2012 में लगाई रोक

    ट्रेड आरक्षकों ने अपने आवेदन में बताया है कि पहले मध्यप्रदेश में नियम जीओपी-57/93 के तहत 5 वर्ष की सेवा के बाद उन्हें जनरल ड्यूटी (जीडी) में संविलियन किया जाता था। इससे उनकी पोस्टिंग थानों में होने से फील्ड में कानून व्यवस्था संभालते थे। लेकिन वर्ष 2012 में इस व्यवस्था को अचानक जीओपी-57/93 के माध्यम से बंद कर दिया गया। नतीजे में 5500 जवान में से कई आज भी अफसरों की निजी सेवा में ही फं से हुए हैं। 

    ट्रेड आरक्षकों पर सालाना 250-300 करोड़ रुपए का खर्च

    प्रदेश के 5500 ट्रेड आरक्षकों के वेतन आदि पर प्रदेश सरकार सालाना लगभग 250-300 करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जबकि वही काम आउटसोर्स के माध्यम से सिर्फ 45 करोड़ रु सालाना खर्च में हो सकता है। यानी हर साल लगभग 250 करोड़ बेवजह खर्च हो रहे हैं, जबकि यह राशि आम जनता के टैक्स से प्राप्त होती है। 

    हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार बताया, फिर भी मध्यप्रदेश में जारी

    मद्रास हाईकोर्ट कई दशक पहले ही अर्दली प्रथा को अवैध बता चुका है। इसके अलावा प्रिवेंशन आॅफ करप्शन एक्ट, 1988 की धारा 13 के अनुसार भी सरकारी स्टाफ को निजी सेवा में लगाना भ्रष्टाचार की श्रेणी में आता है। बावजूद मध्यप्रदेश में यह व्यवस्था दशकों से बरकरार है।

    स्पेशल डीजी ने 100 करोड़ बचाने की फाइल भेजी थी

    पूर्व विशेष पुलिस महानिदेशक (पुलिस रिफार्म्स) शैलेष सिंह ने अर्दली के तौर पर नियमित आरक्षकों की भर्ती से लेकर उनके रिटायरमेंट तक होने वाले वेतन भत्तों के खर्च को सामने रखते हुए प्रस्ताव तत्कालीन पुलिस महानिदेशक सुधीर सक्सेना को प्र्रस्तुत किया था। इसमे कलेक्टर रेट पर अर्दली रखने के साथ ही ट्रेड आरक्षकों को जीडी में संविलियन का मसौदा था, क्योंकि ट्रेड आरक्षक प्रमोशन पाते हुए सहायक उपनिरीक्षक या उपनिरीक्षक स्तर से रिटायर होते हैं। ऐसे में उनका मासिक वेतन 65 से 70 हजार रुपए तक हो जाता है, जबकि काम बंगले पर चाकरी करना ही होता है। यह प्रस्ताव अभी भी विचाराधीन ही है, जिससे ट्रेड आरक्षकों के थानों में पोस्टिंग पूर्व विभागीय परीक्षा शुरू नहीं हो पा रही है। 

    Vijay S. Gaur
    By Vijay S. Gaur

    विजय एस. गौर, पीपुल्स समाचार में रीजनल एडीटर हैं। साथ ही राजनीति, ब्यूरोक्रेसी, क्राइम, खेती-किसानी,...

    Latest Posts