MBA छोड़ सेना चुनी, देश के लिए शहीद हुए...अब उनके नाम से पहचाना जाएगा कठुआ रेलवे स्टेशन, जानिए कौन थे कैप्टन सुनील कुमार चौधरी

श्रीनगर। देश के वीर सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को हमेशा याद रखने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया गया है। जम्मू-कश्मीर के कठुआ रेलवे स्टेशन का नाम अब आधिकारिक तौर पर बदलकर 'शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन, कठुआ' कर दिया गया है। लंबे समय से स्थानीय लोगों और शहीद के परिवार की यह मांग थी कि स्टेशन का नाम उस वीर सैनिक के नाम पर रखा जाए, जिसने मातृभूमि की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे। अब रेल मंत्रालय ने इस पर मुहर लगा दी है।
केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने दी जानकारी
केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इसकी जानकारी साझा करते हुए बताया कि जनता की लंबे समय से चली आ रही मांग को स्वीकार कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि कठुआ रेलवे स्टेशन का नया नाम 'शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी रेलवे स्टेशन, कठुआ' होगा। यह फैसला देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले सैनिक को सच्ची श्रद्धांजलि है।
रेल मंत्रालय ने जारी की अधिसूचना
रेल मंत्रालय ने स्टेशन का नाम बदलने की आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है। इसके साथ ही स्टेशन का नया स्टेशन कोड MSKT निर्धारित किया गया है। सरकार का कहना है कि, यह फैसला उन सैनिकों के सम्मान में लिया गया है, जिन्होंने देश की सुरक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
क्यों उठी थी स्टेशन का नाम बदलने की मांग?
कठुआ के लोगों और शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी के परिजन लंबे समय से स्टेशन का नाम बदलने की मांग कर रहे थे। उनका कहना था कि जिस तरह उधमपुर रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर शहीद कैप्टन तुषार महाजन के नाम पर रखा गया, उसी तरह कठुआ रेलवे स्टेशन को भी कैप्टन सुनील चौधरी के नाम से जाना जाना चाहिए। स्थानीय लोगों का मानना था कि, जम्मू-कश्मीर में प्रवेश करने वाला हर व्यक्ति इस वीर सपूत के बलिदान को याद करे।
कौन थे शहीद कैप्टन सुनील कुमार चौधरी?
कैप्टन सुनील कुमार चौधरी का जन्म 22 जून 1980 को जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले के गोविंदसर गांव में एक सैन्य परिवार में हुआ था। उनके पिता लेफ्टिनेंट कर्नल पी.एल. चौधरी भारतीय सेना में अधिकारी रहे, जबकि माता का नाम सत्या चौधरी है। वे तीन भाइयों में सबसे बड़े थे।
शिक्षा के बाद चुना सेना का रास्ता
कैप्टन सुनील ने शुरुआती पढ़ाई केंद्रीय विद्यालय से की। इसके बाद पुणे के गरवारे कॉलेज ऑफ कॉमर्स से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय से MBA की पढ़ाई भी शुरू की थी। लेकिन इसी दौरान उनके छोटे भाई अंकुर चौधरी का चयन नेशनल डिफेंस एकेडमी (NDA) में हो गया।
कैप्टन मनोज पांडे से मिली प्रेरणा
NDA में प्रशिक्षण के दौरान अंकुर चौधरी ने कैप्टन मनोज कुमार पांडे की वीरता की कहानियां साझा कीं। परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडे भी 11 गोरखा राइफल्स से जुड़े थे। उनसे प्रेरित होकर सुनील कुमार चौधरी ने अपना MBA बीच में छोड़ दिया और 1 जुलाई 2003 को भारतीय सैन्य अकादमी (IMA) में प्रवेश लिया।
खुद चुनी थी गोरखा राइफल्स
IMA से 10 दिसंबर 2004 को पासिंग आउट होने के बाद उन्हें 7/11 गोरखा राइफल्स में कमीशन मिला। उनकी पहली पोस्टिंग कोलकाता स्थित फोर्ट विलियम में हुई। उन्होंने स्वयं इच्छा जताकर गोरखा रेजिमेंट को चुना था।
असम में आतंकियों के खिलाफ कई सफल अभियान
साल 2006 में कैप्टन सुनील कुमार चौधरी को असम के तिनसुकिया जिले में ULFA आतंकियों के खिलाफ काउंटर-इंसर्जेंसी ऑपरेशन में तैनात किया गया। उन्होंने कई सफल अभियानों का नेतृत्व किया और ULFA के दो प्रमुख उग्रवादियों को मार गिराया। उनकी बहादुरी के लिए 26 जनवरी 2008 को उन्हें सेना मेडल से सम्मानित किया गया।
सेना मेडल मिलने के 24 घंटे बाद हो गए शहीद
26 जनवरी को सेना मेडल मिलने के अगले ही दिन, 27 जनवरी 2008 को उन्हें रंगागढ़ गांव में छिपे ULFA आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन का नेतृत्व करने का आदेश मिला। ऑपरेशन के दौरान वे अपनी टीम के साथ आतंकियों से मुकाबला कर रहे थे। इसी दौरान उनकी छाती में गोली लगी। गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उन्होंने मोर्चा नहीं छोड़ा और दो आतंकियों को मार गिराया। देश की रक्षा करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए।
मरणोपरांत मिला कीर्ति चक्र
असाधारण वीरता और अदम्य साहस के लिए कैप्टन सुनील कुमार चौधरी को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें सेना मेडल भी प्रदान किया गया।
ऑपरेशन से पहले मंगेतर से की थी आखिरी बात
रिपोर्ट्स के अनुसार, 27 जनवरी 2008 को आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन पर रवाना होने से पहले कैप्टन सुनील कुमार चौधरी ने अपनी मंगेतर से आखिरी बार बातचीत की थी। इसके कुछ ही घंटों बाद वे आतंकवादियों से लड़ते हुए शहीद हो गए।
उधमपुर के बाद कठुआ स्टेशन का भी बदला नाम
इससे पहले उधमपुर रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर शहीद कैप्टन तुषार महाजन रेलवे स्टेशन रखा गया था। अब उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कठुआ रेलवे स्टेशन को भी एक वीर सैनिक के नाम से जोड़ा गया है।
क्या बदलेगा यात्रियों के लिए?
रेलवे स्टेशन का नाम बदलने से यात्रियों की सेवाओं या रेल संचालन पर कोई असर नहीं पड़ेगा। हालांकि, आने वाले समय में रेलवे के दस्तावेजों, टिकटिंग सिस्टम, स्टेशन साइनबोर्ड और आधिकारिक रिकॉर्ड में स्टेशन का नया नाम और नया स्टेशन कोड MSKT दर्ज किया जाएगा।











