ISKCON :क्या है ISKCON और पुरी मंदिर का विवाद? गजपति महाराज ने राष्ट्रपति-PM को लिखा पत्र

पुरी। पुरी के गजपति महाराज दिव्यसिंह देव ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा और स्नान यात्रा की पारंपरिक व्यवस्था की रक्षा की मांग की है। 8 जुलाई को लिखे गए इस पत्र में उन्होंने ISKCON द्वारा भारत और विदेशों में अलग-अलग तारीखों पर रथयात्रा और स्नान यात्रा आयोजित करने पर आपत्ति जताई है।
शास्त्रों के अनुसार तय तारीखों पर हो आयोजन- दिव्यसिंह
दिव्यसिंह का कहना है कि यह परंपरा शास्त्रों के अनुसार तय तिथियों पर ही होनी चाहिए। अलग-अलग समय पर आयोजन से श्रद्धालुओं में भ्रम फैलता है और जगन्नाथ संस्कृति की मूल परंपरा प्रभावित होती है। गजपति महाराज ने केंद्र सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप कर प्राचीन धार्मिक परंपराओं को सुरक्षित रखने की अपील की है।
क्यों लिखा राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र?
गजपति महाराज का कहना है कि स्कंद पुराण समेत कई धार्मिक ग्रंथों में भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा और रथयात्रा की तिथियां स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं। उनके अनुसार, रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल द्वितीया से शुरू होने वाला नौ दिवसीय उत्सव है, इसलिए इसे मनमाने समय पर आयोजित नहीं किया जा सकता। उन्होंने उज्जैन स्थित ISKCON मंदिर द्वारा 16 से 25 जुलाई के बीच मध्य प्रदेश के 66 स्थानों पर प्रस्तावित रथयात्राओं पर भी आपत्ति जताई है।
उनका मानना है कि धार्मिक आयोजनों की तिथियों में बदलाव से सदियों पुरानी परंपरा कमजोर होगी, इसलिए उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से इस मामले में आवश्यक कदम उठाने की मांग की है।
क्या है इस्कॉन का पक्ष?
ISKCON का कहना है कि भगवान जगन्नाथ केवल पुरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरी दुनिया के श्रद्धालुओं के आराध्य हैं। संस्था के मुताबिक विदेशों में मौसम, सरकारी नियम, स्थानीय प्रशासन की अनुमति और सांस्कृतिक परिस्थितियों के कारण हर जगह पुरी की निर्धारित तिथि पर रथयात्रा निकालना संभव नहीं होता। इसी वजह से अलग-अलग देशों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तिथियां तय की जाती हैं ताकि अधिक से अधिक श्रद्धालु इस उत्सव में भाग ले सकें और जगन्नाथ संस्कृति का वैश्विक प्रचार-प्रसार हो सके।
कौन हैं गजपति महाराज दिव्यसिंह देव?
दिव्यसिंह देव पुरी के वर्तमान गजपति महाराज हैं और जगन्नाथ परंपरा में उन्हें 'ठाकुर राजा' का दर्जा प्राप्त है। उन्हें भगवान जगन्नाथ का प्रथम सेवक माना जाता है और रथयात्रा के दौरान 'छेरा पंहरा' यानी सोने की झाड़ू से रथों की सफाई करने की परंपरा वही निभाते हैं। वर्ष 1970 में मात्र 17 साल की उम्र में उनका राज्याभिषेक हुआ था। उन्होंने कानून की शिक्षा प्राप्त की है और वर्तमान में श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रबंधन समिति (SJTMC) के स्थायी अध्यक्ष भी हैं। मंदिर की धार्मिक परंपराओं और व्यवस्थाओं के संरक्षण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है।
मुख्य रथयात्रा से पहले विदेशों में निकली यात्रा, ISKCON ने बताई वजह
विवाद की एक बड़ी वजह यह है कि ISKCON ने इस साल 14 जून को न्यूयॉर्क, 21 जून को लंदन और 5 जुलाई को सिडनी में रथयात्रा आयोजित कर दी, जबकि पुरी में स्नान पूर्णिमा 29 जून को हुई और मुख्य रथयात्रा 16 जुलाई को निकलेगी। इस पर पुरी मंदिर प्रशासन ने आपत्ति जताई है।
हालांकि, ISKCON का कहना है कि भगवान जगन्नाथ पूरी दुनिया के श्रद्धालुओं के हैं। अलग-अलग देशों में मौसम, सरकारी नियम, स्थानीय परिस्थितियों और भक्तों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए रथयात्रा की तारीखें तय की जाती हैं, ताकि अधिक से अधिक लोग इस उत्सव में शामिल हो सकें और जगन्नाथ संस्कृति का वैश्विक प्रचार-प्रसार हो।











