100 दिन, हजारों मौतें और तबाही...ईरान युद्ध ने दुनिया को कितना बदल दिया?

तेल अवीव/तेहरान। ईरान- अमेरिका का युद्ध, होर्मुज पर जहाजों पर ड्रोन और मिसाइस से लगातार कई हमले। मिडिल ईस्ट में शुरू हुए युद्ध को रविवार 7 जून को 100 दिन पूरे हो गए हैं। ऐसे में इस युद्ध में अब कई जानें गई, अलग- अलग शहरों के स्कूल, इमारतें सहित कितनी जगह नुकसान पहुंचा। इतना ही नहीं ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह खामेनेई की मौत भी इसी युद्ध के दौरान हुई थी।
जनवरी-फरवरी 2026 में ईरान के भीतर राजनीतिक और सामाजिक तनाव तेज हो गया था। लोरेस्तान, तेहरान और अन्य शहरों में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए, जिनमें हिंसा, आगजनी और पुलिस स्टेशनों पर हमले तक की घटनाएं सामने आईं। कई स्थानों पर सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव में स्थिति और बिगड़ गई। सरकार ने इन प्रदर्शनों को “आतंकी गतिविधियों” से जोड़ा, जबकि विपक्ष ने इसे जनअसंतोष बताया।
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी से हुई युद्ध की शुरुआत
28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर बड़ा हवाई और समुद्री हमला शुरू किया, जिसे ऑपरेशन एपिक फ्यूरी नाम दिया गया। हमले में सैन्य ठिकानों, एयर डिफेंस सिस्टम और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी विमानवाहक पोतों से लड़ाकू विमान और मिसाइलें दागी गईं।
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कई दौर चली बातचीत बेनतीजा रही
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए ओमान और जिनेवा में कई दौर की बातचीत हुई। फरवरी 2026 में हुई बैठकों में ईरानी और अमेरिकी प्रतिनिधियों ने अलग-अलग स्तर पर चर्चा की, लेकिन कोई ठोस समझौता नहीं हो सका। बातचीत विफल होने के कुछ ही दिनों बाद स्थिति युद्ध की ओर बढ़ गई।
ईरान के कई देशों पर हमले, होर्मुज बंद से वैश्विक तेल आपूर्ति ठप
ईरान ने जवाबी कार्रवाई में बहरीन, तेल अवीव, कुवैत और सऊदी अरब में ड्रोन और मिसाइल हमले किए। होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की घोषणा ने वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित किया। कई देशों में अमेरिकी ठिकानों पर भी हमले हुए, जिससे संघर्ष मध्य पूर्व से बाहर फैल गया।
लगातार हमलों से ईरान और आसपास के क्षेत्रों में तेल रिफाइनरी, सैन्य अड्डे और नागरिक ढांचे को भारी नुकसान हुआ। दुबई, कुवैत और सऊदी अरब में भी विस्फोट और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। हजारों लोगों के मारे जाने और बड़े पैमाने पर विस्थापन की रिपोर्टें आईं।
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ईरान के बीच नेतृत्व परिवर्तन
मार्च 2026 में ईरान के अंदर राजनीतिक बदलाव के तहत नए सुप्रीम लीडर के रूप में मुज्तबा खामेनेई के नाम की घोषणा की गई। इसे युद्ध के बीच बड़ा सत्ता परिवर्तन माना गया, जिसने ईरान की आंतरिक राजनीति को और जटिल बना दिया।
समुद्री युद्ध और वैश्विक असर
अप्रैल 2026 तक संघर्ष समुद्र तक फैल गया। तेल टैंकरों, मालवाहक जहाजों और नौसैनिक बेड़ों पर हमले हुए। इससे वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर असर पड़ा और अंतरराष्ट्रीय बाजार अस्थिर हो गए। जनवरी 2026: ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों से आंतरिक अस्थिरता शुरू हुई।
अमेरिका को 6 दिन में 11.3 अरब डॉलर का नुकसान
अमेरिका को इस युद्ध में अब तक भारी नुकसान हुआ है। लेबनान में अब तक 3500 से ज्यादा लोग मारे गए, जबकि 10 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित किए गए हैं। इनमें 29 इजरायली सैनिक और तीन इजरायली नागरिकों की मौत भी हुई है। बात कुवैत की करें यो यहां करीब 11.3 अरब डॉलर का नुकसान पहुंचा है। तेल आपूर्ति बाधित होने के कारण ईरान को ईंधन में अरबों डॉलर का फायदा पहुंचा है।
टाइमलाइन में देखें अब तक क्या- क्या हुआ?
जनवरी 2026
ईरान में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों से आंतरिक अस्थिरता शुरू हुई।
यह संकेत था कि संकट सिर्फ बाहरी नहीं, बल्कि अंदरूनी स्तर पर भी गहरा है।
फरवरी 2026
अमेरिका-ईरान के बीच ओमान और जिनेवा वार्ता विफल रही।
शांति प्रयास टूटते ही हालात तेजी से युद्ध की ओर बढ़ गए।
28 फरवरी 2026
ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के तहत अमेरिका-इजरायल ने बड़ा हमला किया।
यह संघर्ष का निर्णायक मोड़ बना और क्षेत्रीय युद्ध की शुरुआत हुई।
1–7 मार्च 2026
- ईरान और सहयोगी देशों ने बहरीन, तेल अवीव, सऊदी और कुवैत में जवाबी हमले किए।
- इससे युद्ध मध्य पूर्व के कई देशों तक फैल गया और नियंत्रण मुश्किल हो गया।
मार्च 2026
- होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति पर सीधा असर पड़ा।
- ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल और अंतरराष्ट्रीय महंगाई का खतरा बढ़ गया।
मार्च 2026 के बाद: समुद्री और हवाई दोनों मोर्चों पर लगातार हमले जारी रहे।
यह युद्ध पारंपरिक सीमाओं से निकलकर मल्टी-फ्रंट संघर्ष बन गया।
अप्रैल 2026: तेल टैंकरों और नौसैनिक जहाजों पर हमलों से वैश्विक व्यापार प्रभावित हुआ।
अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन और समुद्री सुरक्षा संकट में आ गई।
क्या असर पड़ रहा: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच सीधा टकराव वैश्विक शक्ति संतुलन बदल रहा है।
यह संघर्ष आने वाले वर्षों की अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था तय कर सकता है।











