Shivani Gupta
7 Jan 2026
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पेयजल से हुई मौतों का मामला देशभर में गहन चिंता का विषय बन गया है। वहीं इस घटना को लेकर कांग्रेस ने इंदौर के सभी वार्डों में प्रदर्शन शुरू कर दिया है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी प्रदर्शन में शामिल हुए और राज्य सरकार पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए।
उधर, मंगलवार (6 जनवरी) को इस मामले की सुनवाई मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस घटना ने इंदौर शहर की छवि को गहरा नुकसान पहुंचाया है। कोर्ट ने कहा कि इंदौर देश का सबसे स्वच्छ शहर माना जाता है, लेकिन अब दूषित पेयजल के कारण यह पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पीने का पानी ही दूषित हो, तो यह बेहद गंभीर चिंता का विषय है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह समस्या सिर्फ शहर के एक इलाके तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे इंदौर शहर के पेयजल की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं। इसी को देखते हुए कोर्ट ने इस मामले में मुख्य सचिव को सुनने की जरूरत बताई।मंगलवार की सुनवाई में शीर्षकोर्ट ने अगली सुनवाई में मध्य प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी को वर्चुअली पेश होने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी को होगी।
इस बीच, दूषित पानी पीने से मरने वालों की संख्या बढ़कर 17 हो गई है। फिलहाल 110 मरीज विभिन्न अस्पतालों में भर्ती हैं। अब तक कुल 421 मरीजों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जिनमें से 311 मरीज स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हो चुके हैं। वहीं, 15 मरीजों की हालत गंभीर बनी हुई है और उनका इलाज आईसीयू में चल रहा है।
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, उल्टी-दस्त के 38 नए मामले सामने आए हैं। इनमें से 6 मरीजों को बेहतर इलाज के लिए अरबिंदो हॉस्पिटल रेफर किया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग अलर्ट मोड पर है, लेकिन सवाल अब भी बने हुए हैं कि आखिर देश के सबसे स्वच्छ शहर में लोगों को सुरक्षित पेयजल क्यों नहीं मिल पा रहा है।
इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतों के मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अहम तथ्य सामने आए हैं। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 31 दिसंबर 2025 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और नगर निगम को नागरिकों को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के स्पष्ट निर्देश दिए थे। हालांकि, याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि प्रभावित क्षेत्रों में अब भी जो पानी सप्लाई किया जा रहा है, वह स्वच्छ और पीने योग्य नहीं है। उनका कहना है कि रिपोर्ट में किए गए दावों के बावजूद जमीनी हकीकत इससे अलग है और लोगों को अब भी दूषित पानी ही मिल रहा है।
इस मामले में दायर अन्य याचिकाओं में प्रशासन की गंभीर लापरवाही का मुद्दा भी उठाया गया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि इस घटना से पहले स्थानीय निवासियों ने दूषित पानी को लेकर कई बार शिकायतें की थीं, लेकिन प्रशासन और नगर निगम ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया। अगर समय रहते इन शिकायतों को गंभीरता से लिया गया होता और आवश्यक रोकथाम के कदम उठाए गए होते, तो इतने बड़े स्तर पर लोग बीमार नहीं पड़ते और जान-माल का नुकसान टल सकता था। कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए संकेत दिए कि पूरे मामले की गहराई से जांच जरूरी है। अगली सुनवाई में प्रशासन की जवाबदेही और किए गए कदमों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी।