डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा रुपया,जानिए किन 3 बड़े कारणों से बढ़ रहा दबाव और क्या होगा असर

भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेतों के बावजूद रुपया लगातार दबाव में है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले करीब 97 के स्तर तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह गिरावट सिर्फ एक वजह से नहीं, बल्कि कई घरेलू और वैश्विक कारणों के मेल से हो रही है। आमतौर पर मजबूत आर्थिक विकास किसी देश की मुद्रा को सहारा देता है, लेकिन भारत के मामले में हालात अलग नजर आ रहे हैं। 2018 के बाद से रुपया हर साल कमजोर हुआ है और 2026 में भी यही रुझान जारी है।
पहला कारण:कच्चे तेल और आयात पर बढ़ती निर्भरता
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे डॉलर की मांग लगातार बढ़ती रहती है। तेल की कीमतों में हालिया तेजी ने आयात बिल और बढ़ा दिया है, जिससे रुपये पर सीधा दबाव पड़ा है। इसके अलावा सोना, चांदी और उर्वरक जैसे जरूरी आयात भी लगातार महंगे होते जा रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक इन चार प्रमुख वस्तुओं का आयात पिछले कुछ वर्षों में दोगुने से ज्यादा बढ़ चुका है। जितना ज्यादा आयात होगा, उतनी ही ज्यादा डॉलर की जरूरत पड़ेगी और इससे रुपया कमजोर होता है।
दूसरा कारण: विदेशी निवेशकों की निकासी और वैश्विक अनिश्चितता
एक बड़ा कारण विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से पैसा निकालना भी है। इस साल अब तक करीब 23 अरब डॉलर भारतीय शेयर बाजार से बाहर जा चुके हैं। जब विदेशी निवेशक पैसा निकालते हैं तो उसे डॉलर में बदलते हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। साथ ही वैश्विक स्तर पर चल रहे युद्ध और टैरिफ विवादों ने भी निवेशकों को सुरक्षित बाजारों की ओर मोड़ दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में निवेश के बावजूद टेक्नोलॉजी और एआई जैसे नए सेक्टरों में अपेक्षित हिस्सेदारी कम होने से भी विदेशी पूंजी का रुझान कमजोर हुआ है।
तीसरा कारण: चालू खाता घाटा और बढ़ता व्यापार असंतुलन
भारत लगातार आयात ज्यादा और निर्यात कम करने की स्थिति में बना हुआ है। जनवरी में व्यापार घाटा बढ़कर करीब 34 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया था। जब देश जितना कमाता है उससे ज्यादा खर्च करता है, तो उसे बाहर से डॉलर लाने की जरूरत पड़ती है। यही असंतुलन रुपये पर दबाव बनाता है। इसके साथ ही महंगाई दर में बढ़ोतरी और बढ़ता आयात बिल भी स्थिति को और मुश्किल बना रहा है।
रुपये की कमजोरी के संभावित असर
रुपया कमजोर होने का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। आयात महंगे होने से पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स और दवाइयों की कीमतों में बढ़ोतरी का खतरा रहता है। हालांकि इसका एक फायदा यह भी है कि विदेश में काम करने वाले भारतीयों को ज्यादा रुपये मिलते हैं। भारत रेमिटेंस प्राप्त करने वाले देशों में सबसे ऊपर है और हर साल अरबों डॉलर देश में आते हैं। लेकिन अगर रुपया और गिरता है तो महंगाई और बढ़ सकती है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।
सरकार और आरबीआई की कोशिशें
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और सरकार रुपये को स्थिर करने की कोशिश में लगे हुए हैं। आरबीआई समय-समय पर डॉलर बेचकर बाजार में हस्तक्षेप करता है ताकि रुपये की गिरावट को रोका जा सके। सरकार ने सोना-चांदी के आयात पर शुल्क बढ़ाने जैसे कदम भी उठाए हैं ताकि डॉलर की मांग को कम किया जा सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक व्यापार घाटा और वैश्विक दबाव कम नहीं होगा, रुपये पर तनाव बना रहेगा।
आगे क्या?
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ती हैं या वैश्विक तनाव जारी रहता है तो रुपया 100 के स्तर तक भी पहुंच सकता है। फिलहाल स्थिति यही दिखाती है कि रुपये की चाल सिर्फ घरेलू नहीं बल्कि वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों पर भी बहुत ज्यादा निर्भर है।












